भारतीय खानपान की पहचान लंबे समय से रोटी, चावल, दाल, सब्जी, दही और घर के बने भोजन से रही है. लेकिन समय के साथ हमारी प्लेट में काफी बदलाव आया है. पहले जहां भोजन में मोटे अनाज, दालें, सब्जियां और घर का बना खाना ज्यादा खाया जाता था. वहीं अब रिफाइंड अनाज, सफेद चावल, मैदा से बनी चीजें और पैकेज्ड व प्रोसेस्ड फूड की हिस्सेदारी बढ़ी है. नाश्ते में मैदा वाली ब्रेड, लंचडिनर में फ्रोजन फूड्स को खाना अब ट्रेंड है. विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और प्रोसेस्ड फूड्स का आसानी से मिलना, इन तरीकों ने लोगों के खानपान को प्रभावित किया है.

ऐसे खाने में अक्सर एनर्जी, सॉल्ट, शुगर और अनहेल्दी फैटी की मात्रा ज्यादा होती है. डब्ल्यूएचओ ही कहती है कि हमें दिन भर में 0.6 ग्राम नमक खाना चाहिए. लेकिन लोग इससे कहीं ज्यादा नमक नॉर्मली खा जाते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि भारतीयों की थाली में क्याक्या बदलाव आए हैं और इस वजह से कौनकौन से खतरे बढ़ गए हैं.
खेती के तरीके ने भी बदली अनाज की तस्वीर
डॉक्टर नीरज गोयल का कहना है कि हमारे भोजन में बदलाव सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं है. खेती, अनाज की प्रोसेसिंग और बाजार में उपलब्ध खाने की चीजों में बदलाव का असर भी हमारी प्लेट पर पड़ा है. ट्रेडिशनली इस्तेमाल किए जाने वाले कई मोटे और कम प्रोसेस्ड अनाज अब रोजमर्रा के भोजन में उतनी प्रमुखता से शामिल नहीं हैं, जबकि पॉलिश किए हुए चावल और रिफाइंड गेहूं से बने उत्पाद ज्यादा आसानी से उपलब्ध हैं.
अनाज को ज्यादा प्रोसेस और रिफाइन करने से उसमें मौजूद कुछ फाइबर और पोषक तत्व कम हो सकते हैं. इसलिए विशेषज्ञ आमतौर पर केवल कार्बोहाइड्रेट की मात्रा नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान देने की सलाह देते हैं.
आटे में मैदा की मिलावट क्यों चिंता की बात?
रोटी भारतीय भोजन का अहम हिस्सा है, लेकिन हर रोटी समान नहीं होती. अगर आटे में मैदा या अत्यधिक रिफाइंड आटा शामिल है, तो इससे भोजन में फाइबर की मात्रा कम हो सकती है. समस्या खासतौर पर तब बढ़ती है जब पूरी डाइट में साबुत अनाज, दाल, सब्जियां और अन्य फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ कम हों. हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि हर जगह आटे में मिलावट हो रही है या मैदा मिला आटा सीधे बीमारी पैदा करता है. दिक्कत इसमें है कि अब रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट पर ज्यादा डिपेंडेंसी और डाइट में की कमी है.
चावल भी दुश्मन नहीं, पर मात्रा मायने रखती है
चावल को पूरी तरह से डाइट से हटाने की जरूरत नहीं है. चावल कार्बोहाइड्रेट और ऊर्जा का अहम सोर्स है. समस्या तब हो सकती है जब प्लेट का ज्यादातर पार्ट चावल या किसी दूसरे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट से भर जाए. उसमें दाल, सब्जियां, प्रोटीन और फाइबर की पर्याप्त मात्रा न हो. हाल के भारतीय डेटा में कम गुणवत्ता वाले कार्बोहाइड्रेट, जिनमें सफेद चावल और रिफाइंड अनाज शामिल हैं, को मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के कुछ जोखिमों से जोड़ा गया है. इसलिए सवाल यह नहीं है कि रोटी खाएं या चावल?, बल्कि यह है कि प्लेट में रोटी या चावल के साथ क्या और कितनी मात्रा में है?
अनाज की मिलावट से भी बढ़ता है जोखिम
खाने की गुणवत्ता पर बात करते समय मिलावट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अनाज और आटे में मिलावट या खराब क्वालिटी वाले प्रोडक्ट्स का यूज न्यूट्रिशन और फूड सेफ्टी दोनों के लिहाज से चिंता का विषय हो सकता है. हालांकि, हर पैकेट या हर खुले अनाज को मिलावटी मान लेना भी सही नहीं है. ऐसे में उपभोक्ताओं को भरोसेमंद सोर्स से अनाज और आटा खरीदना चाहिए. इसके अलावा पैकेज्ड फूड्स या प्रोडक्ट्स पर लेबल देखना चाहिए और भोजन में एक ही अनाज पर निर्भर रहने के बजाय बदलाव भी करना चाहिए.
प्लेट से ज्यादा लाइफस्टाइल में बदलाव
भारतीय प्लेट में बदलाव के साथ हमारी रोजमर्रा की एक्टिविटी भी कम हुई हैं. पहले लोग रोजाना चलना, सीढ़ियां चढ़ना, घरेलू काम और दूसरी फिजिकल एक्टिविटी ज्यादा करते थे. आज लंबे समय तक बैठकर काम करना, स्क्रीन टाइम और मोटराइज्ड ट्रांसपोर्ट पर निर्भरता बढ़ने से कई लोगों का फिजिकली एक्टिव रहना कम हो गया है.
अगर प्लेट में कैलोरी और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट ज्यादा हैं पर बॉडी उस एनर्जी का ठीक से यूज नहीं कर पा रही है, तो आगे चलकर वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक हेल्थ पर बुरा असर पड़ने का खतरा बढ़ सकता है.
कैसी होनी चाहिए हमारी प्लेट?
विशेषज्ञों के अनुसार स्वस्थ प्लेट का मतलब रोटी या चावल को पूरी तरह छोड़ना नहीं है. जरूरत है बैलेंस और ऑप्शन की. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। खाने में साबुत या कम प्रोसेस्ड अनाज, दालें, सब्जियां, फल, पर्याप्त प्रोटीन और हेल्दी फैट को शामिल करना जरूरी है. थाली में सिर्फ रोटी या चावल की मात्रा कम करना ही समाधान नहीं है. सबसे जरूरी है कि फिजिकल एक्टिव भी रहें. क्योंकि अब लोग घर से बाहर कम निकलते हैं और जंक फूड खाने के ज्यादा आदी हो गए हैं.



