सोने की अपनी भारी मांग को पूरा करने के लिए, भारत अब इस बात को लेकर अधिक सक्रिय हो गया है कि यह कीमती धातु कहां से मंगाई जाए. कई दशकों तक, तरीका बहुत सीधा था: स्विट्जरलैंड के सुरक्षित गोदामों से सीधे शुद्ध और मुहर लगा गोल्ड का आयात करना. आज, इस पारंपरिक तरीके में बदलाव आ रहा है. टैक्स में छूट, भारतसंयुक्त अरब अमीरात व्यापार समझौते के तहत मिलने वाले विशेष टैरिफ लाभ, और देश के भीतर सोने को शुद्ध करने की बढ़ती क्षमता के कारण, भारत के सोने के आयातक अब अपने सोर्स बदलने लगे हैं.

स्विस सोने की चमक फीकी पड़ रही है

पिछले 5 सालों में, भारत के सोने के आयात के स्रोतों में भौगोलिक स्तर पर बड़ा बदलाव आया है. इसका मुख्य कारण देश के भीतर रिफाइनिंग उद्योग का विस्तार है. लंदन स्टॉक एक्सचेंज ग्रुप के लीड मेटल्स एनालिस्ट देबाजीत साहा ने ईटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसेजैसे रिफाइनिंग क्षमता बढ़ी है, भारतीय रिफाइनरों ने ‘डोरे’ के लिए मजबूत सप्लाई चेन तैयार कर ली है. इससे स्विट्जरलैंड से आने वाले शुद्ध सोने पर भारत की पारंपरिक निर्भरता कम हो गई है.

‘डोरे’ सोने का एक ऐसा रूप है जिसे आंशिक रूप से शुद्ध किया गया होता है. इसमें अक्सर चांदी जैसी अन्य धातुएं भी मिली होती हैं. इसे रिफाइनरीज में और अधिक शुद्ध करके सोने की छड़ें और सिक्के बनाए जाते हैं. साहा ने कहा कि रिफाइनरों को मिलने वाले 0.65 फीसदी ड्यूटी लाभ ने इस बदलाव को और मजबूत किया है.

वहीं, भारतUAE व्यापार समझौते ने ‘टैरिफरेट कोटा’ के जरिए आयात का एक नया रास्ता खोल दिया है. इन बदलावों की वजह से भारत के पास अब सोना मंगाने के कई विकल्प हो गए हैं. अब स्विट्जरलैंड का हिस्सा कम हो रहा है, जबकि अन्य सप्लायर्स और रास्ते अधिक महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं.

भारत के टैरिफ नियमों के अनुसार, तैयार सोने की तुलना में ‘डोरे’ पर 0.65 फीसदी कम टैक्स लगता है. इससे देश के भीतर काम करने वाली रिफाइनरियों को फायदा होता है, क्योंकि वे ज्यूरिख से तैयार सोना मंगाने के बजाय, यहीं पर सोना शुद्ध करना ज्यादा फायदेमंद मानती हैं.

मई 2022 में, भारत और UAE के बीच ‘कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट’ लागू हुआ. इस समझौते के तहत, भारत ने ‘टैरिफ रेट कोटा’ सिस्टम के जरिए UAE से सोने के आयात पर सामान्य आयात शुल्क से 1% कम टैरिफ लगाने की अनुमति दी. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, शुरुआत में कोटा सालाना 120 टन तय किया गया था, जो 2027 से बढ़कर 200 टन हो जाएगा. यह भारत के सोने के आयात का लगभग 25% हिस्सा कवर करेगा.

भारत ने 13 मई, 2026 से सोने पर स्टैंडर्ड आयात शुल्क को 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया था. UAE कोटे के तहत आयात किए जाने वाले सोने पर 14% का शुल्क लगता है, जो स्टैंडर्ड रेट से 1 प्रतिशत कम है. वहीं, कच्चे सोने पर 14.35% का आयात शुल्क लगता है—जो तैयार सोने पर लगने वाली 15% की स्टैंडर्ड रेट से 0.65 प्रतिशत कम है.

दुबई का फैक्टर

स्विट्जरलैंड, UAE और यूनाइटेड किंगडम लंबे समय से भारत के लिए सोने के प्रमुख स्रोत रहे हैं, जबकि अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों ने घरेलू रिफाइनरीज में इस्तेमाल होने वाले कच्चे सोने की बड़ी सप्लाई की है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। लेकिन अब यह व्यापार का नक्शा बदल रहा है.

क्रिसिल इंटेलिजेंस के निदेशक सेहुल भट्ट के अनुसार, भारत के सोने के इंपोर्ट में स्विट्जरलैंड की हिस्सेदारी पांच साल पहले के 42.4 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2026 में लगभग आधी यानी 21.9 अ रह गई है. वहीं, UAE की हिस्सेदारी 10.8 फीसदी से बढ़कर 16.5 फीसदी हो गई है.

भट्ट ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि इस बदलाव के पीछे एक बड़ा कारण भारतUAE CEPA है. उन्होंने कहा कि पिछले पांच सालों में घरेलू रिफाइनिंग क्षमता बढ़ने से घाना, चिली और पेरू से कच्चे सोने के आयात में भी तेजी आई है, जिससे भारत की सोने की सप्लाई चेन और अधिक diversified हुई है.

जून 2026 में भारत ने UAE से 649.4 मिलियन डॉलर मूल्य का सोना आयात किया, जो जून 2025 के 235.9 मिलियन डॉलर के मुकाबले 175.2 फीसदी अधिक है.

सोने के लिए UAE की ओर भारत के बढ़ते झुकाव पर चेतावनी देते हुए, GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि यह चलन चिंता पैदा करता है क्योंकि UAE में न तो सोने का खनन होता है और न ही वहां कोई बड़ी प्रोसेसिंग होती है. ऐसा लगता है कि इस व्यापार का एक बड़ा हिस्सा तीसरे देशों से दुबई के रास्ते सोना मंगाने का है, जिसका मकसद सिर्फ भारत में लगने वाले कम टैरिफ का फायदा उठाना है.

GTRI ने सुझाव दिया है कि भारत के व्यापार संतुलन और विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा के लिए ‘ओरिजिन रूल्स’ को सख्त किया जाए, FTA के तहत कीमती धातुओं पर दी गई रियायतों की समीक्षा की जाए, और भविष्य के व्यापार समझौतों से सोना, चांदी, प्लैटिनम और हीरे को बाहर रखा जाए.

सुप्रा पैसिफिक फाइनेंशियल सर्विसेज के CEO मनोज रवि ने कहा कि भारतUAE व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते जैसे व्यापार समझौते व्यापार को आसान बना सकते हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि ‘ओरिजिन रूल्स’ को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और टैरिफ का फायदा केवल तभी मिले जब वास्तव में कोई ‘वैल्यू एडिशन’ किया गया हो.

भारत में आने वाला सोना: अलगअलग रूप

भारत में आने वाला सारा सोना एक ही काम के लिए नहीं होता. कुछ सोना ‘डोरे’ के रूप में आता है, तो कुछ रिफाइंड बुलियन के रूप में आता है, जिसे जौहरी सीधे इस्तेमाल कर सकते हैं.

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की रिफाइनिंग क्षमता बढ़ रही है, जिससे सोना मंगाने के तरीकों में बदलाव आ रहा है. अब पारंपरिक बुलियन सेंटर्स के अलावा अन्य जगहों से भी कच्चा सोना मंगाने के रास्ते खुल रहे हैं.

केंद्रीय बैंक द्वारा सोने की खरीद का तरीका बिल्कुल अलग होता है. साहा के अनुसार, यह खरीद जौहरियों या आम निवेशकों की मांग के कारण नहीं, बल्कि ‘रिजर्व मैनेजमेंट’ के उद्देश्य से की जाती है. 2026 की दूसरी तिमाही में भारत का स्वर्ण भंडार 880.52 टन था, जो पिछली तिमाही के बराबर ही है.

भारत में सोना किस रास्ते से आएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कौन मंगा रहा है और इसका इस्तेमाल या प्रोसेसिंग कहां होगी. ‘मेटल्स फोकस’ के रिसर्च कंसल्टेंट आदर्श दिवे ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि हरियाणा की कोई रिफाइनरी अगर ‘डोरे’ मंगाती है, तो वह आमतौर पर दिल्ली के रास्ते आता है. वहीं, अगर सोने का इस्तेमाल आभूषण निर्यात के लिए होना है, तो वह मुंबई के रास्ते आ सकता है ताकि सांताक्रूज इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग ज़ोन की यूनिट्स तक पहुंच सके.

उन्होंने आगे बताया कि केंद्रीय बैंक द्वारा मंगाया जाने वाला सोना अलग होता है, और यह किस रास्ते से आता है, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती है. यह अंतर इसलिए मायने रखता है क्योंकि भारत हर साल लगभग 700900 टन सोने का आयात करता है और चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोने का कंज्यूमर है. भारत में सोने का व्यापार मुख्य रूप से आभूषणों और निवेश की मांग से चलता है, जबकि आधिकारिक खरीद का उद्देश्य अलग होता है जिसमें देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बनाना और उसका प्रबंधन करना शामिल है.

महत्वपूर्ण पहलू

सोना देश में किस रूप में और किस रास्ते से आ रहा है—चाहे वह रिफाइनिंग के लिए ‘डोरे’ हो या निर्माण और निवेश के लिए रिफाइंड बुलियन—इसका असर देश के भीतर होने वाले ‘वैल्यू एडिशन’ और आभूषण उद्योग की Competitiveness पर पड़ता है. रवि के अनुसार, अमेरिका की बदलती ट्रेड पॉलिसीज भी ग्लोबन लेवल पर सोने के फ्लो को प्रभावित कर सकती हैं. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे कौन से कदम उठाते हैं और उनका अलगअलग ट्रेड रूट्स पर क्या असर पड़ता है. उन्होंने आगे कहा कि आगे चलकर, भारत का ध्यान एक पारदर्शी, मजबूत और किफायती ‘गोल्ड सप्लाई चेन’ बनाने पर होना चाहिए. इससे देश के भीतर रिफाइनिंग को बढ़ावा मिलेगा, आभूषण उद्योग के इकोसिस्टम को मदद मिलेगी और यह सुनिश्चित होगा कि व्यापार से मिलने वाले लाभ देश के लिए वास्तविक आर्थिक मूल्य में बदलें.