
नेपाल में 26 अगस्त की फ्लैश फ्लड (Flash flood) ने एक बार फिर दिखा दिया कि हिमालय की ऊंचाइयों में जमा पानी कब और कैसे तबाही बनकर नीचे उतर सकता है. वैज्ञानिक अध्ययनों और आधिकारिक मॉनिटरिंग के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र में 200 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें ऐसी हैं, जिन्हें हाई रिस्क वाली माना जाता है. सवाल यह है कि अगर इनमें से कोई झील अचानक फट गई तो क्या भारत के मैदानी इलाकों तक इसकी लहर पहुंच सकती है? खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर में.
नेपाल में कुछ मिनटों में कैसे मची तबाही?
26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवा और तिब्बत सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटने और भूस्खलन के बाद अचानक फ्लैश फ्लड की स्थिति बनी. भोटे कोसी और त्रिशुली नदी तंत्र में अचानक पानी और मलबे का दबाव बढ़ा, जिससे निचले इलाकों में तबाही का खतरा पैदा हुआ. न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल में फ्लैश फ्लड/ग्लेशियर हादसे से तिब्बत और नेपाल में 750 लोगों की मौत और लापता लोगों की संख्या 3,044 बताई गई है.
नेपाल फ्लैश फ्लड/ग्लेशियर हादसे की घटना सिर्फ नेपाल की आपदा नहीं है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। इसने हिमालय के उन ग्लेशियरों और झीलों की ओर ध्यान खींचा है, जहां बढ़ता तापमान, पिघलते ग्लेशियर और अस्थिर प्राकृतिक बांध भविष्य की बड़ी आपदा का कारण बन सकते हैं.
क्या हिमालय में 200 से ज्यादा ‘वॉटर बम’ तैयार हो रहे हैं?
अंतर्राष्ट्रीय संस्था ICIMOD और UNDP के अध्ययनों के मुताबिक नेपाल से जुड़े कोसी, गंडकी और कर्णाली बेसिन में 3,600 से अधिक ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं. इनमें 47 झीलों को बेहद खतरनाक श्रेणी में रखा गया है. पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र की बात करें तो 200 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें संभावित रूप से गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं.
यही वजह है कि भू वैज्ञानिक ऐसी झीलों को आम बोलचाल की भाषा में ‘वॉटर बम’ या ‘टाइम बम’ कहते हैं, क्योंकि इनके फटने का असर कुछ ही समय में पहाड़ों से निकलकर नीचे की घाटियों तक पहुंच सकता है और तबाही मचा सकता है.

Credit: ICIMOD and UNDP
Totol कितने ‘वॉटर बम’?
हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच सैकड़ों ग्लेशियल झीलें तेजी से आकार बदल रही हैं. वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक पूरे हिमालयी क्षेत्र में 200 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें हाई-रिस्क श्रेणी में हैं. वहीं ISRO और सरकारी आंकड़ों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में करीब 7,500 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं, जिनमें 2,431 झीलें 10 हेक्टेयर से बड़ी हैं. अहम सवाल- अगली तबाही का कारण कौन?
नेपाल-तिब्बत सीमा पर कितनी खतरनाक हैं ये झीलें?
नेपाल और तिब्बत से जुड़े हिमालयी क्षेत्र में कई झीलों को संभावित रूप से बेहद खतरनाक माना गया है. ICIMOD के अध्ययनों में नेपाल से जुड़े कोसी, गंडकी और कर्णाली बेसिन की ग्लेशियल झीलों पर विशेष निगरानी की जरूरत बताई गई है. इनमें थुलागी, छो रोल्पा, इम्जा छो, थुलोपोखरी/लोअर बरुण, लुमडिंग छो और होंगु-2 जैसी झीलें प्रमुख हैं.
थुलागी झील क्यों बनी चिंता?
थुलागी झील मनास्लु क्षेत्र में स्थित है. इसके आकार में पिछले दशकों में बदलाव दर्ज किया गया है. ग्लेशियरों के पीछे हटने और झील के विस्तार के कारण इस क्षेत्र को संभावित GLOF जोखिम के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है.

Credit: ICIMOD and UNDP
छो रोल्पा में क्या है खतरा?
दोलखा जिले में स्थित छो रोल्पा नेपाल की प्रमुख मोरेन-बांध वाली ग्लेशियल झीलों में शामिल है. झील के आसपास मौजूद प्राकृतिक बांध में अस्थिरता पैदा होने पर अचानक पानी नीचे की घाटियों की ओर तेजी से बढ़ सकता है.
इम्जा छो क्यों है ‘टाइम बम’?
एवरेस्ट क्षेत्र में स्थित इम्जा छो का आकार ग्लेशियरों के पिघलने के साथ बढ़ा है. झील के बढ़ते जलस्तर और आसपास के ग्लेशियरों में बदलाव ने इसे लंबे समय से वैज्ञानिक निगरानी के दायरे में रखा है.
थुलोपोखरी से कितना बड़ा खतरा?
संखुवासभा क्षेत्र की थुलोपोखरी/लोअर बरुण झील भी संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में गिनी जाती है. ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऐसी झीलों का प्राकृतिक बांध टूटने पर नीचे की नदी घाटियों में अचानक बाढ़ और भारी मात्रा में मलबा पहुंच सकता है.
लुमडिंग छो और होंगु-2 पर क्यों नजर?
लुमडिंग छो और होंगु-2 भी हिमालयी क्षेत्र की उन ग्लेशियल झीलों में शामिल हैं जिनकी स्थिति और जलस्तर में बदलाव पर वैज्ञानिक नजर रखते हैं. इन झीलों के आसपास ग्लेशियर, बर्फ और मोरेन की स्थिति में बदलाव संभावित GLOF जोखिम को प्रभावित कर सकता है.
असली खतरा झील नहीं, उसका अचानक फटना है
इन झीलों को ‘वॉटर बम’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके पीछे अक्सर बर्फ, पत्थर और मलबे से बने प्राकृतिक बांध होते हैं. भारी बारिश, हिमस्खलन, भूकंप या ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा झील में गिरने से बांध पर अचानक दबाव बढ़ सकता है.
अगर यह प्राकृतिक बांध टूट गया तो लाखों घनमीटर पानी और मलबा कुछ ही समय में नीचे की घाटियों की ओर दौड़ सकता है. इसी घटना को GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood कहा जाता है.
नेपाल की हालिया फ्लैश फ्लड ने इसी खतरे को फिर सामने ला दिया है. हिमालय की ऊंचाइयों पर शांत दिखने वाली ये झीलें आने वाले समय में कितनी बड़ी आपदा का कारण बन सकती हैं, अब यही सबसे बड़ा सवाल है.

Credit: ICIMOD and UNDP
कौन-सी ग्लेशियल झीलें सबसे ज्यादा खतरनाक हैं?
नेपाल और तिब्बत से जुड़े हिमालयी क्षेत्र में कई झीलों पर लंबे समय से वैज्ञानिकों की नजर है. इनमें थुलागी झील, छो रोल्पा, इम्जा छो, थुलोपोखरी/लोअर बरुण, लुमडिंग छो और होंगु क्षेत्र की झीलें प्रमुख हैं.
छो रोल्पा नेपाल की सबसे चर्चित जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों में से एक है. वहीं एवरेस्ट क्षेत्र की इम्जा छो में ग्लेशियरों के पिघलने के कारण झील के विस्तार को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है. इन झीलों का खतरा केवल इनके आकार से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि इनके आसपास मौजूद बर्फ, मलबे और मोरेन से बने प्राकृतिक बांध कितने स्थिर हैं.
झील को ‘वॉटर बम’ क्यों कहा जा रहा है?
पहाड़ों में ग्लेशियर पीछे हटता है तो उसके आसपास पिघला हुआ पानी जमा होने लगता है. कई जगह यह पानी बर्फ, पत्थर और मलबे से बने प्राकृतिक बांध के पीछे झील का रूप ले लेता है. समस्या यह है कि यह बांध किसी कंक्रीट की दीवार की तरह मजबूत नहीं होते.
भूकंप, भारी बारिश, हिमस्खलन, चट्टानों के गिरने या ग्लेशियर के बड़े हिस्से के झील में गिरने से अचानक पानी का दबाव बढ़ सकता है. अगर प्राकृतिक बांध टूट गया तो कुछ ही समय में लाखों घनमीटर पानी और मलबा नीचे की ओर दौड़ सकता है. इसी घटना को GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood कहा जाता है.
क्या नेपाल जैसी तबाही भारत तक पहुंच सकती है?
हिमालयी नदियों का नेटवर्क कई देशों को जोड़ता है. नेपाल और तिब्बत से निकलने वाली नदियां भारत के उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई क्षेत्रों से होकर आगे बढ़ती हैं.
इसलिए ऊपरी हिमालय में होने वाली किसी बड़ी GLOF घटना का असर केवल उसी स्थान तक सीमित नहीं रहता. पानी के साथ चट्टान, बर्फ और मलबा नीचे की ओर आने पर पुल, सड़कें, बिजली परियोजनाएं और नदी किनारे बसे इलाके इसकी चपेट में आ सकते हैं. यही वजह है कि नेपाल की हालिया फ्लैश फ्लड को भारत के लिए भी एक अलर्ट सिग्नल के तौर पर देखा जा रहा है.
भारत में कितने ‘वॉटर बम’ मौजूद हैं?
भारत के हिमालयी राज्यों में भी बड़ी संख्या में ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं. NDMA, ISRO-NRSC और CWC जैसी सरकारी संस्थाएं उपग्रह और अन्य तकनीकों के जरिए इन झीलों की पहचान, निगरानी और जोखिम आकलन करती हैं.
उपलब्ध सरकारी और वैज्ञानिक अध्ययनों में भारत में सैकड़ों संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है. इनमें लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के ऊंचाई वाले क्षेत्र प्रमुख हैं.
लद्दाख में क्या खतरा है?
लद्दाख और काराकोरम क्षेत्र में ऊंचाई पर स्थित कई ग्लेशियल झीलें और बर्फीले जल निकाय मौजूद हैं. दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इनकी निगरानी अपने आप में बड़ी चुनौती है.
सिक्किम क्यों बना हुआ है चिंता का केंद्र?
साउथ ल्होनक झील का नाम भारत में GLOF के खतरे के साथ विशेष रूप से जुड़ा है. अक्टूबर 2023 में झील से जुड़ी GLOF घटना ने तीस्ता नदी घाटी में भारी तबाही मचाई थी. इस घटना ने दिखाया कि ऊंचाई पर बनी एक ग्लेशियल झील का अचानक टूटना कितनी तेजी से नीचे के इलाकों को प्रभावित कर सकता है.
हिमाचल में कौन से इलाके संवेदनशील हैं?
लाहौल-स्पीति और किन्नौर जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की मौजूदगी के कारण सतलुज तथा अन्य नदी घाटियों पर विशेष निगरानी जरूरी है.

Credit: ICIMOD and UNDP
उत्तराखंड में खतरा कितना बड़ा है?
उत्तराखंड में ऊपरी हिमालय से निकलने वाली नदियों के आसपास कई ग्लेशियल झीलें और ग्लेशियर मौजूद हैं. नेपाल सीमा से लगे क्षेत्रों में किसी बड़े GLOF या फ्लैश फ्लड का असर नदी घाटियों में तेजी से नीचे की ओर पहुंच सकता है.
अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर का क्या?
अरुणाचल प्रदेश में तवांग और ऊपरी नदी घाटियों के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की निगरानी महत्वपूर्ण है. वहीं जम्मू-कश्मीर में चिनाब और झेलम बेसिन के ऊपरी हिस्सों में मौजूद ग्लेशियर और जल निकाय भी जोखिम आकलन का हिस्सा हैं.
क्या Climate Change ‘वॉटर बम’ को और खतरनाक बना रहा है?
यही सबसे बड़ा सवाल है. तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघलते और पीछे हटते हैं. इससे कई जगह ग्लेशियरों के सामने या उनके पीछे पानी जमा होकर नई झीलें बनती हैं अथवा पुरानी झीलों का आकार बढ़ता है. जितना ज्यादा पानी जमा होगा, प्राकृतिक बांध पर उतना ही दबाव बढ़ सकता है. इसके साथ मौसम की चरम घटनाएं, भारी बारिश, हिमस्खलन और भूस्खलन इस जोखिम को और बढ़ा सकते हैं.
क्या वैज्ञानिक इन झीलों पर नजर रख रहे हैं?
ICIMOD पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की निगरानी से जुड़े अध्ययन करता है. भारत में ISRO-NRSC के उपग्रह डेटा और CWC तथा NDMA की निगरानी व्यवस्था संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और जोखिम आकलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. उपग्रह तस्वीरों से झील के आकार में बदलाव, आसपास के ग्लेशियरों की स्थिति और संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है.
नेपाल की घटना से सबसे बड़ा सबक क्या मिला?
नेपाल की फ्लैश फ्लड ने एक बात साफ कर दी है किहिमालय में खतरा सिर्फ ग्लेशियरों के पिघलने का नहीं है, बल्कि उन झीलों का भी है जिनमें पिघला हुआ पानी जमा हो रहा है. आज जो झील पहाड़ों के बीच शांत दिखाई देती है, वही प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में कुछ ही घंटों या मिनटों में नीचे की पूरी नदी घाटी के लिए संकट बन सकती है.
इसलिए हिमालय में मौजूद 200 से ज्यादा उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों को सिर्फ आंकड़ों के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है. इनके लिए लगातार सैटेलाइट मॉनिटरिंग, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, डाउनस्ट्रीम अलर्ट नेटवर्क और स्थानीय स्तर पर आपदा तैयारी जरूरी है.
नेपाल की तबाही एक चेतावनी है. सवाल यह नहीं कि हिमालय में पानी जमा है या नहीं. सवाल यह है कि अगला ‘वॉटर बम’ कब, कहां और कितनी ताकत से फटेगा?



