Featured Image

Auraiya Jinda Bhandara : उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के लक्ष्मणपुर गांव में एक अनोखा और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक बुजुर्ग अपने जीवन के अंतिम समय में ही अपनी ‘जिंदा तेरहवीं’ का आयोजन कर रहा है।

इस बुजुर्ग ने अपने जीवन में अकेलेपन और अनाथपन की पीड़ा को झेलते हुए जीते-जी ही अपना भंडारा करने का निर्णय लिया है, और इसके लिए उसने अपने नाम से कार्ड भी बनवाया है, जिसमें ‘जिंदा भंडारा’ लिखा हुआ है। यह कार्ड स्थानीय लोगों में वितरित किया जा रहा है और सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है।

यह मामला जिले के लक्ष्मणपुर गांव का है, जहां 65 वर्षीय राकेश यादव ने सोमवार को अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में अपने घर पर ही करीब 2000 लोगों के लिए भोज का आयोजन करने का फैसला किया है। वह अपने जीवन में अकेलेपन और पारिवारिक त्रासदी के चलते इस तरह का कदम उठा रहे हैं। उनके अनुसार, उनका यह भोज उनके ‘जिंदा तेरहवीं’ के रूप में माना जा रहा है, जिसमें वह अपने जीवन की अंतिम यात्रा का स्वागत कर रहे हैं।

राकेश यादव का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है। उनके तीन भाई हैं, जिनमें से दो की मौत हो चुकी है। सबसे बड़े भाई चंद्रपाल यादव बीमारियों से जूझते हुए चल बसे, जबकि दूसरे भाई नरेश यादव को गांव में ही किसी ने मार डाला। परिवार में कोई भी उनके साथ नहीं है, न तो कोई उनके अंतिम संस्कार या तेरहवीं का सहारा बनेगा, न ही कोई उनके साथ है। राकेश ने अपना पैतृक घर भी एक रिश्तेदार को दान कर दिया है, ताकि वह अपने अंतिम समय में अकेले न रहें।

राकेश का कहना है कि उन्हें अपने जीवन के इस अंतिम पड़ाव में कोई सहारा नहीं है। उनके पास न तो कोई अपना है, और न ही कोई भरोसेमंद साथी। वह बताते हैं कि उम्र के इस मोड़ पर न तो उनके पास कोई पुत्र-पौत्र हैं, और न ही उनके कोई संतानें हैं। उनके परिवार में एक विवाहित बहन है, जिनके दो बेटे और एक बेटी है, लेकिन वह भी उनसे दूर रहती है।

गांव में इस ‘जिंदा भंडारे’ की खबर फैलते ही लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। कुछ लोग इसे राकेश का दुःख मान रहे हैं, तो कुछ इसे उनके अकेलेपन का प्रतीक कह रहे हैं। उनका कहना है कि वह अपने अंतिम समय में इस भोज के जरिए अपने जीवन का समापन करना चाहते हैं और गांव के ही लोगों को इसमें हिस्सा लेने का न्योता भी दिया है। ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। बताया जाता है कि यह आयोजन भोज तक ही सीमित रहेगा, पिंडदान आदि धार्मिक अनुष्ठान नहीं होंगे।

राकेश का कहना है कि उनके इस कदम का मकसद केवल यह है कि उनके अंतिम समय में कोई उनके साथ हो, और गांव के लोग उनके इस अनूठे प्रयास में शामिल हों। वह कहते हैं कि उनका यह ‘जिंदा भंडारा’ उनके जीवन की अंतिम यात्रा का एक हिस्सा है, जो उन्हें अकेलेपन से राहत देगा।

यह मामला समाज में अकेलेपन, बुजुर्गों की अनदेखी और पारिवारिक रिश्तों की कमजोरी को उजागर करता है। गांव में इस अनोखे आयोजन को लेकर चर्चा जारी है, और लोग इसे उनके जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक अनूठा प्रयास मान रहे हैं। राकेश यादव का यह कदम समाज में बुजुर्गों के प्रति जागरूकता और उनके जीवन के अंतिम पड़ाव को सम्मान देने का संदेश भी दे रहा है।