भारत के बुनियादी ढांचे में लगातार अपना विस्तार कर रहे गौतम अडानी ने अब एक और बड़ा दांव चला है. सीमेंट और तांबे के कारोबार में कदम रखने के बाद, अडानी ग्रुप अब देश के सबसे अहम मेटल्स में से एक, एल्युमिनियम सेक्टर में उतरने जा रहा है. इसके लिए कंपनी ने अबू धाबी की इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी के साथ 50:50 का जॉइंट वेंचर बनाया है. इस साझेदारी के तहत ओडिशा में लगभग 1.1 लाख करोड़ रुपये का भारीभरकम निवेश किया जाएगा. यह भारत के मेटल सेक्टर के इतिहास के सबसे बड़े निवेशों में से एक है.

दो बड़ी कंपनियों के दबदबे वाले बाजार में नया खिलाड़ी

भारत के एल्युमिनियम बाजार पर लंबे समय से केवल दो दिग्गजों, हिंडाल्को तथा वेदांता का राज रहा है. देश के कुल उत्पादन का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं दोनों कंपनियों के पास है. इस सेक्टर में नई कंपनी का आना आसान नहीं होता, क्योंकि इसके लिए खदान, रिफाइनरी, बिजली से लेकर लॉजिस्टिक का एक बहुत बड़ा नेटवर्क चाहिए होता है. लेकिन अडानी का यह नया प्रोजेक्ट पूरी तरह से इंटीग्रेटेड होगा. ओडिशा में लगने वाले इस प्लांट में सालाना 40 लाख टन क्षमता की एल्यूमिना रिफाइनरी, 20 लाख टन क्षमता का एल्युमिनियम स्मेल्टर तथा 4,000 मेगावाट का पावर प्लांट शामिल होगा. इसके अलावा 10 लाख टन क्षमता का डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग पार्क भी बनेगा. भारत ने वित्तीय वर्ष 2025 में करीब 42 लाख टन एल्युमिनियम का उत्पादन किया था. ऐसे में अडानी का 20 लाख टन का यह नया स्मेल्टर देश के कुल उत्पादन में एक बहुत बड़ा इजाफा करेगा.

इस भारी निवेश के पीछे की असल वजह

सवाल यह है कि अडानी ने इसी समय एल्युमिनियम को ही क्यों चुना? दरअसल, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक होने के बावजूद आज भी अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए इस धातु का आयात करता है. सरकार के विजन डॉक्यूमेंट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 में देश की एल्युमिनियम खपत 55 लाख टन है, जो 2030 तक 85 लाख टन तक पहुंच सकती है. वहीं, 2047 तक इसके 2.8 करोड़ टन होने का अनुमान है. अगर प्रति व्यक्ति खपत की बात करें, तो दुनिया का औसत 8 से 12 किलो है, जबकि भारत में यह आंकड़ा केवल 3.4 से 3.9 किलो के बीच है. इससे साफ पता चलता है कि भविष्य में गाड़ियों, बिजली के तारों, निर्माण कार्य से लेकर घरेलू सामानों तक एल्युमिनियम की मांग तेजी से बढ़ने वाली है. करण अडानी के मुताबिक, कंपनी का लक्ष्य किसी का मार्केट शेयर छीनना नहीं है, बल्कि भविष्य की इस विशाल मांग को पूरा करना है.

सस्ती बिजली से मिलेगी सबसे बड़ी ताकत

एल्युमिनियम बनाने में सबसे ज्यादा खर्च बिजली का आता है. यह पूरी इंडस्ट्री ऊर्जा पर ही टिकी है. यहीं पर अडानी ग्रुप को सबसे बड़ा फायदा मिलने वाला है. कंपनी के पास पहले से ही भारत का एक बहुत बड़ा पावर जनरेशन पोर्टफोलियो है. इस नए प्रोजेक्ट में 4 गीगावाट का कैप्टिव पावर प्लांट लगेगा, जिसके साथ 400 मेगावाट की ग्रीन एनर्जी का भी विकल्प होगा. सस्ती ऊर्जा ही उन्हें इस बाजार में सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दिलाएगी. इसके साथ ही, ग्रुप के अपने ही पोर्ट, डेटा सेंटर तथा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में एल्युमिनियम की भारी मांग है, जिससे उनके अपने उत्पादों की खपत ग्रुप के भीतर ही आसानी से हो सकेगी.

ओडिशा का चुनाव महज इत्तेफाक नहीं

इस महाप्रोजेक्ट के लिए ओडिशा को चुनना एक सोचीसमझी रणनीति का हिस्सा है. भारत का आधे से ज्यादा बॉक्साइट ओडिशा में ही पाया जाता है. नया रिफाइनरी प्लांट रायगड़ा जिले में खदानों के पास लगेगा, जबकि स्मेल्टर सुंदरगढ़ में बनेगा. इसके लिए कच्चा माल बल्लाडा, कुत्रुमाली समेत कई अन्य खदानों से आएगा. इसके अलावा, माल ढुलाई के लिए अडानी ग्रुप के ही स्वामित्व वाले धामरा पोर्ट का इस्तेमाल होगा. एक टन एल्युमिनियम बनाने के लिए करीब आठ टन कच्चे माल की आवाजाही करनी पड़ती है, जिसके लिए रेलवे तथा कन्वेयर बेल्ट का खास नेटवर्क तैयार किया जा रहा है.