अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मध्यावधि चुनावों में एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा है. विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण कर लिया है. वाशिंगटन के इस बदले सियासी माहौल ने नई दिल्ली के लिए राहत के दरवाजे खोल दिए हैं. व्यापार जगत के जानकारों का मानना है कि इस चुनावी नतीजे के बाद प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते में भारत पर अमेरिकी दबाव काफी कम हो जाएगा. अब भारत अपनी जरूरतों के हिसाब से एक संतुलित डील फाइनल कर सकता है.

ट्रंप की मनमानी पर लगेगी लगाम
इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनावी नतीजों ने पूरे समीकरण को बदल कर रख दिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति की शक्तियां अब सीमित हो जाएंगी क्योंकि संसद उन्हें मनमाने फैसले लेने की खुली छूट नहीं देगी. जानकारों का कहना है कि बातचीत की मेज पर अब पलड़ा भारत के पक्ष में झुक गया है. इससे भारत सरकार पर दबाव कम होगा. बदली हुई परिस्थितियों का फायदा उठाकर एक संतुलित समझौता किया जा सकता है, जो अब पूरी तरह संभव दिख रहा है. संसद के पास व्यापार से जुड़े अधिकार होने के कारण ट्रंप के बचे हुए कार्यकाल में बिना सोचेसमझे टैरिफ बढ़ाए जाने की आशंका खत्म हो गई है. पिछले महीने ही अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा था कि वाशिंगटन भारत के साथ ट्रेड डील फाइनल करने के बेहद करीब है.
टैरिफ की दोबारा हो सकती है समीक्षा
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का मानना है कि चुनावी नतीजों से मुख्य व्यापार समझौते के मौजूदा प्रावधानों में बदलाव की संभावना कम है. हालांकि, टैरिफ की समीक्षा जरूर हो सकती है. सबनवीस के अनुसार, अगर अमेरिकी नागरिकों को लगता है कि ऊंचे टैरिफ की वजह से अमेरिका में महंगाई बढ़ रही है, तो दरों की समीक्षा संभव है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। इस कदम से भारत समेत कई देशों को सीधा फायदा मिलेगा.
टेक्सटाइल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के पूर्व चेयरमैन विजय अग्रवाल ने बताया कि डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से ट्रंप की टैरिफ नीतियों की संसदीय जांच बढ़ेगी. इससे भारतीय कपड़ा निर्यातकों को बेहतर शर्तें हासिल करने का मौका मिलेगा. उन्होंने ये भी साफ किया कि मौजूदा 18 फीसदी टैरिफ में तुरंत बदलाव की उम्मीद नहीं है. डील में थोड़ी देरी या अनिश्चितता आ सकती है, इसलिए भारत को ट्रंप प्रशासन के साथसाथ डेमोक्रेटिक नियंत्रण वाली संसद से भी लगातार संवाद बनाए रखना चाहिए.
छोटे कारोबारियों को चाहिए स्थिर माहौल
अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाजार है. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस के महानिदेशक अजय सहाय का कहना है कि आने वाले महीनों में भारतीय निर्यातकों के लिए सबसे अहम ये होगा कि टैरिफ के अलावा बाजार पहुंच पर अमेरिकी नीति क्या आकार लेती है. खासकर छोटे व मझोले उद्यमों को अपने ऑर्डर की सही कीमत तय करने के लिए एक स्थिर व्यापारिक माहौल की जरूरत होती है. इसी के आधार पर वे महीनों पहले अपनी शिपमेंट की योजना बनाते हैं. आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में अमेरिका को होने वाला भारतीय निर्यात सालाना आधार पर 11 फीसदी बढ़कर 50.8 अरब डॉलर पर पहुंच गया. इसी दौरान भारत का आयात भी 26 फीसदी बढ़कर 32.3 अरब डॉलर रहा.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बदला था गणित
फरवरी में दोनों देशों ने BTA के पहले चरण के लिए एक रूपरेखा तैयार की थी. इसमें अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद से जुड़े भारतीय आयात पर लगे अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ को वापस लेने का वादा किया था. साथ ही, पारस्परिक टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी करने पर सहमति बनी थी. लेकिन 20 फरवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के तहत लगाए गए इन पारस्परिक शुल्कों को खारिज कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट के इस कदम के बाद, अमेरिका ने जबरन श्रम के कथित मामलों की जांच से जुड़ी धारा 301 के तहत भारतीय सामानों पर 10 फीसदी की नई ड्यूटी लगा दी. ये नियम भारत के अलावा 16 अन्य देशों पर भी लागू किया गया है. हालांकि, ये दर जून में वाशिंगटन द्वारा प्रस्तावित 12.5 फीसदी टैरिफ के मुकाबले कम है. अब अमेरिकी संसद में सत्ता बदलने के बाद भारतीय निर्यातकों को उम्मीद है कि व्यापार से जुड़े नियम ज्यादा स्पष्ट रहेंगे.



