नौकरी करने वाले लोगों के लिए हाउस रेंट अलाउंस टैक्स बचाने का एक अहम तरीका है. यह सैलरी का वह हिस्सा होता है, जो कर्मचारियों को घर का किराया चुकाने के लिए दिया जाता है. हालांकि, HRA पर टैक्स छूट का फायदा केवल पुरानी टैक्स व्यवस्था में मिलता है. नई टैक्स व्यवस्था चुनने वाले कर्मचारियों को मिलने वाले पूरे HRA पर टैक्स देना पड़ता है.

कई लोग नौकरी के लिए एक शहर में किराये के मकान में रहते हैं, जबकि उनके मातापिता किसी दूसरे शहर में रहते हैं. ऐसे में वे अपने रहने के लिए और मातापिता के घर का किराया भी चुकाते हैं. सवाल है कि क्या दोनों मकानों के किराये पर HRA की टैक्स छूट मिल सकती है?

क्या दूसरे मकान के किराये पर भी मिलेगी छूट?

इनकम टैक्स कानून के सेक्शन 10 के तहत HRA पर कुछ शर्तों के साथ टैक्स छूट मिलती है. इसके लिए कर्मचारी को वास्तव में किराये के जिस मकान में रहना है, उसका किराया देना जरूरी है. इनकम टैक्स विभाग के मुताबिक, HRA पर छूट उसी आवास के किराये के लिए मिलती है, जिसमें कर्मचारी खुद रहता है. इसलिए अगर कोई कर्मचारी नौकरी वाले शहर में किराये के मकान में रहता है और दूसरे शहर में मातापिता के मकान का किराया भी चुकाता है, तो वह मातापिता के मकान के किराये पर HRA छूट नहीं ले सकता. इसी तरह, अगर कोई कर्मचारी अपने खुद के मकान में रहता है और किराया नहीं देता, तो वह HRA पर टैक्स छूट का दावा नहीं कर सकता.

कैसे होती है HRA की गणना?

HRA पर मिलने वाली टैक्स छूट की गणना तीन रकम के आधार पर होती है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। इनमें से जो रकम सबसे कम होती है, उसी पर छूट मिलती है. पहली नियोक्ता से मिलने वाला असल HRA, दूसरा, कुल किराये में से सैलरी का 10% घटाने के बाद बची रकम और तीसरी मेट्रो शहरों में सैलरी का 50% और अन्य शहरों में 40% के बराबर पैसा. यहां सैलरी की गणना में निर्धारित नियमों के अनुसार बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ता शामिल हो सकते हैं. मेट्रो शहरों में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई आते हैं.

HRA नहीं मिलता तो क्या करें?

जिन कर्मचारियों को सैलरी में HRA नहीं मिलता, वे सेक्शन 10 के तहत इस छूट का दावा नहीं कर सकते. हालांकि, पात्र वेतनभोगी और स्वरोजगार वाले लोग इनकम टैक्स कानून के सेक्शन 80GG के तहत किराये पर कटौती का लाभ ले सकते हैं. इसके लिए निर्धारित शर्तों को पूरा करना जरूरी है.