Featured Image

दशहरे पर रावण का पुतला जलाने की परंपरा देशभर में निभाई जाती है. इस दौरान बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रावण का पुतला जलाना भी किसी के अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है? ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ में एक शख्स ने इसी सवाल को लेकर राज्य मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटा दिया. उसका तर्क था कि महाभारत के दुर्योधन ने रावण से भी ज्यादा पाप किए थे, फिर भी हर साल दशहरे पर रावण का पुतला जलाया जाता है. शिकायतकर्ता ने इसे भेदभाव बताते हुए रावण के अधिकारों का मुद्दा उठा दिया.

मामला आयोग के सामने पहुंचा, तो अधिकारी भी हैरान रह गए. शिकायत पर सुनवाई करने वाले आयोग के अध्यक्ष गिरधारी नायक ने शख्स को समझाया कि मानवाधिकार आयोग इंसानों के अधिकारों से जुड़े मामलों पर विचार करता है, न कि पौराणिक पात्रों से जुड़ी ऐसी दलीलों पर. आयोग ने यह भी साफ किया कि रावण को कानूनी अर्थ में इंसान की कैटेगरी में नहीं रखा जा सकता, इसलिए यह मामला उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है.

क्या है पूरा मामला?

यह मामला छत्तीसगढ़ राज्य मानवाधिकार आयोग (CGSHRC) से जुड़ा है. दशहरे के आसपास एक व्यक्ति ने आयोग में शिकायत देकर रावण का पुतला जलाने की परंपरा पर आपत्ति जताई. उसका तर्क था कि हर साल रावण के पुतले को जलाना उसके अधिकारों के खिलाफ है और इसे भेदभाव के तौर पर देखा जाना चाहिए.

शिकायतकर्ता ने क्या कहा?

शिकायतकर्ता ने अपनी बात रखने के लिए महाभारत के दुर्योधन का उदाहरण भी दिया. उसका कहना था कि दुर्योधन ने रावण के मुकाबले कहीं ज्यादा गंभीर गलतियां की थीं. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर बुराई के प्रतीक को जलाना ही मकसद है, तो हर दशहरे पर रावण को ही क्यों जलाया जाता है और दुर्योधन को इससे अलग क्यों रखा जाता है?

आयोग ने क्या कहा?

इस शिकायत पर आयोग के अध्यक्ष गिरधारी नायक ने सुनवाई की. उन्होंने बताया कि शिकायत मिलने पर अधिकारी भी हैरान रह गए थे. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में नायक ने कहा कि उन्होंने शिकायतकर्ता को समझाया कि आयोग इंसानों के मानवाधिकारों से जुड़े मामलों को देखता है, पौराणिक पात्रों से जुड़े सवालों को नहीं.

आयोग ने क्या फैसला सुनाया?

आयोग ने शिकायत को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए मंजूर नहीं किया. इसकी वजह बताते हुए कहा गया कि रावण एक पौराणिक पात्र है और उसे कानूनी अर्थ में इंसान की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है. इसलिए उसके पुतले को जलाने से जुड़े सवाल पर मानवाधिकार आयोग कार्रवाई नहीं कर सकता है. शिकायतकर्ता को सलाह दी गई कि अगर वह इस मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहता है, तो किसी दूसरे सही मंच का रुख करे.