यस बैंक के ₹8,415 करोड़ के AT1 बॉन्ड को राइटऑफ करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बैंक, केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक को झटका दिया है. कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के जनवरी 2023 के फैसले को बरकरार रखा है. हाईकोर्ट ने बैंक के वित्तीय संकट के दौरान इन बॉन्ड को रद्द करने के फैसले को खारिज कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यस बैंक के शेयरों में 20% की गिरावट दर्ज की गई.

जस्टिस दीपांकर दत्ता की अगुवाई वाली पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई कारण नहीं है. कोर्ट ने इस मामले में पहले लगाई गई रोक भी हटा दी और केंद्र सरकार, RBI और यस बैंक की अपीलें खारिज कर दीं. इसके बाद यस बैंक ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके असर की समीक्षा कर रहा है. शेयर में आई तेज गिरावट को लेकर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ने भी बैंक से स्पष्टीकरण मांगा था. इस पर बैंक ने बताया कि वह फैसले की पूरी कॉपी प्राप्त करने की प्रक्रिया में है. फैसले का विस्तार से अध्ययन करने और उसके प्रभावों को समझने के बाद बैंक आगे की जानकारी शेयर करेगा.
क्या है ₹8,415 करोड़ के बॉन्ड का पूरा मामला?
मार्च 2020 में वित्तीय संकट से जूझ रहे यस बैंक के पुनर्गठन के दौरान ₹8,415 करोड़ के AT1 बॉन्ड को राइटऑफ कर दिया गया था. आसान भाषा में समझें तो इन बॉन्ड में निवेश करने वालों की रकम को बैंक ने अपने खातों से खत्म कर दिया था. इन बॉन्ड में संस्थागत निवेशकों, म्यूचुअल फंड और आम निवेशकों ने पैसा लगाया था.
इसके बाद बॉन्डधारकों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने बैंक के इस फैसले को चुनौती देते हुए अपने निवेश की रकम वापस दिलाने की मांग की. जनवरी 2023 में हाईकोर्ट ने निवेशकों के पक्ष में फैसला सुनाया था. हाईकोर्ट का कहना था कि बॉन्ड को राइटऑफ करना बैंक के अंतिम पुनर्गठन प्लान का हिस्सा नहीं था. कोर्ट के मुताबिक, 13 मार्च 2020 को बैंक के पुनर्गठन के बाद प्रशासक ने बॉन्ड राइटऑफ करके अपने अधिकारों से आगे जाकर काम किया था.
केंद्र सरकार और RBI ने क्या दलील दी थी?
केंद्र सरकार, RBI और यस बैंक ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. केंद्र सरकार का कहना था कि बॉन्ड राइटऑफ करना कानूनी था और यह कदम बैंक के 2 लाख से अधिक जमाकर्ताओं और खाताधारकों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी था. RBI ने दलील दी थी कि बॉन्ड को उनके नियमों और नियामकीय शर्तों के अनुसार राइटऑफ किया गया था. बैंक में सरकारी पूंजी और दूसरे निवेशकों का पैसा आने से पहले यह कदम उठाया गया था, ताकि जमाकर्ताओं के हित सुरक्षित रखे जा सकें. यस बैंक का कहना था कि 2016 के सूचना दस्तावेजों और RBI के नियमों में AT1 बॉन्ड को स्थायी रूप से राइटऑफ करने का प्रावधान था. बैंक के मुताबिक, भारतीय स्टेट बैंक और दूसरे निवेशकों से पूंजी मिलने से पहले ऐसा करना जरूरी था.
क्या होते हैं AT1 बॉन्ड?
AT1 यानी Additional Tier1 बॉन्ड बैंकों के लिए पूंजी जुटाने का एक तरीका है. इनके जरिए बैंक निवेशकों से पैसा लेते हैं और उस पूंजी का इस्तेमाल अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत करने के लिए कर सकते हैं. हालांकि, ये सामान्य फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह सुरक्षित नहीं होते. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। बैंक गंभीर वित्तीय संकट में पहुंचने पर इन बॉन्ड की रकम को नियमों और शर्तों के तहत पूरी तरह राइटऑफ किया जा सकता है. ऐसे में निवेशकों को अपना पूरा पैसा गंवाने का जोखिम रहता है. यस बैंक के मामले में बॉन्डधारकों ने इसी राइटऑफ को चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए बैंक, केंद्र सरकार और RBI की अपीलें खारिज कर दी हैं.
बैंकिंग सेक्टर पर क्या हो सकता है असर?
इस मामले में सरकार और RBI ने अदालत में चेतावनी दी थी कि हाईकोर्ट के फैसले को लागू करने से बैंकिंग सिस्टम और संकट में फंसे बैंकों के पुनर्गठन की भविष्य की प्रक्रियाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है. वित्त मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार, 31 दिसंबर 2022 तक बैंकों के ₹1,02,466 करोड़ के AT1 बॉन्ड और ₹1,92,702 करोड़ के टियर2 बॉन्ड बकाया थे. इनमें बड़ी हिस्सेदारी सरकारी बैंकों की थी. सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐसे बॉन्ड में निवेश करने वालों और बैंकों के संकट के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के लिए अहम है. अब इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रहने से बॉन्डधारकों के पक्ष को कानूनी सहारा मिला है.



