नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही बहुप्रतीक्षित मेगाबजट फिल्म ‘रामायण: पार्ट 1’ का हाल ही में जारी हुआ नया गाना ‘मंगल रंग’ रिलीज़ होते ही सोशल मीडिया और संगीत जगत में तीखी चर्चा का केंद्र बन गया है। ऑस्कर विजेता संगीतकार ए.आर. रहमान द्वारा स्वरबद्ध, प्रख्यात कवि कुमार विश्वास द्वारा रचित और अरिजीत सिंह व श्रेया घोषाल की युगल आवाजों से सजे इस गीत का उद्देश्य भगवान श्री राम और माता सीता के पवित्र, दिव्य प्रेम तथा विवाह उत्सव का संगीतमय जश्न मनाना था। ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। हालांकि, इसके रिलीज़ होते ही इस ट्रैक के संगीत निर्देशन, धुन की संरचना और गायकी की शैली को लेकर श्रोताओं के बीच मिलीजुली प्रतिक्रियाएं और आलोचनाएं सामने आने लगी हैं।

कुछ सुनने वालों को यह गाना जानापहचाना सा लग रहा है; वे इसकी तुलना ‘रॉकस्टार’ फिल्म के गाने ‘कुन फया कुन’ और रहमान के ही तमिल गाने ‘एन्ना सोल्ला पोगिराई’ से कर रहे हैं। वहीं, कुछ लोगों ने इसमें ‘कव्वाली’ की झलक मिलने पर सवाल उठाए हैं। उनका पूछना है कि क्या हिंदू महाकाव्य पर आधारित फिल्म के लिए इस तरह की संगीत शैली सही है?

तो, असल में समस्या क्या है? क्या यह संगीत की वजह से है, इसके धार्मिक जुड़ाव की वजह से है, या फिर ‘रामायण’ फिल्म से जुड़ी बहुत बड़ी उम्मीदों की वजह से है? आइए, इसे समझते हैं।

ए.आर. रहमान द्वारा रचित, श्रेया घोषाल और अरिजीत सिंह द्वारा गाए गए, और कुमार विश्वास द्वारा लिखे गए इस गाने ‘मंगल रंग’ में राम और सीता के मिलन को दिखाया गया है। फिल्म में राम और सीता का किरदार रणबीर कपूर और साई पल्लवी ने निभाया है। गाने के वीडियो में उनके रिश्ते को स्वयंवर से लेकर विवाह तक दिखाया गया है। इसके दृश्य उतने ही भव्य हैं, जितनी इस स्तर की फिल्म से उम्मीद की जाती है। फिर भी, इस गाने को लेकर लोगों की राय एक जैसी नहीं है।

क्या रहमान का संगीत कुछ ज़्यादा ही जानापहचाना लग रहा है?
एक आलोचना यह है कि ‘मंगल रंग’ सुनकर लोगों को रहमान के पुराने काम की याद आती है। एक ऐसे संगीतकार के लिए, जिसने दशकों तक भारतीय सिनेमा के संगीत को गढ़ा है, यह एक जायज़ सवाल है: आखिर कब एक जानीपहचानी संगीत शैली ‘दोहराव’ लगने लगती है? क्या किसी गाने का जानापहचाना लगना उसे अपने आप ‘मौलिक न होने’ की श्रेणी में डाल देता है, या यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह गाना कहानी के साथ कैसे घुलमिल रहा है? यह तो एक बहस हुई। दूसरी बहस थोड़ी और जटिल है।

लोगों को इसमें ‘कव्वाली’ क्यों सुनाई दे रही है?
कुछ लोगों का कहना है कि गाने का कोरस, बारबार ‘रंग’ शब्द का इस्तेमाल और पूरे गाने की बनावट उन्हें ‘कव्वाली’ की याद दिलाती है। इस वजह से लोग इसकी तुलना एक मशहूर सूफी रचना ‘आज रंग है’ से भी कर रहे हैं।

कव्वाली की जड़ें सूफी भक्ति परंपरा में हैं। इसमें अक्सर कुछ पंक्तियाँ बारबार दोहराई जाती हैं, समूह में गायन होता है और संगीत की तीव्रता धीरेधीरे बढ़ती जाती है। लेकिन ये खूबियाँ सिर्फ कव्वाली तक ही सीमित नहीं हैं। अगर किसी को कोई गाना कव्वाली जैसा लगता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह सचमुच एक पारंपरिक कव्वाली ही है।

गाने के बोल से भी एक और संकेत मिलता है। ‘मंगल रंग’ राम और सीता के मिलन पर केंद्रित है, जिसमें सिंदूर, सौभाग्य और मर्यादा का जिक्र है। इसमें किसी इस्लामी देवता या सूफी संत का कोई स्पष्ट आह्वान नहीं है। इसलिए, बहस स्पष्ट रूप से इस्लामी गीतों के बारे में नहीं है, बल्कि उन संगीत प्रभावों के बारे में है जिन्हें कुछ श्रोता महसूस करते हैं।

और यहीं से एक बड़ा सवाल उठता है: अगर गीत के शब्द राम और सीता का गुणगान करते हैं, तो क्या संगीत की शैली मायने रखती है?

कुछ दर्शकों के लिए, यह मायने रखती है। रामायण केवल सिनेमा के लिए अपनाई गई कोई आम कहानी नहीं है। करोड़ों लोगों के लिए, यह पवित्र है, बेहद निजी है और पीढ़ियों से उनकी आस्था का हिस्सा रही है। इसलिए, राम और सीता के विवाह का जश्न मनाने वाले किसी गीत को एक सामान्य रोमांटिक गाने की तुलना में अलग पैमाने पर परखा जा सकता है। ऐसे दर्शक उम्मीद कर सकते हैं कि संगीत में वे धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं झलकें, जिन्हें वे इस महाकाव्य से जोड़कर देखते हैं।

वहीं, कुछ लोग संगीत को एक ऐसी रचनात्मक भाषा के रूप में देख सकते हैं, जो कहानी के मूल भाव को नुकसान पहुंचाए बिना अलगअलग परंपराओं से तत्व ले सकती है। दोनों ही दृष्टिकोण समझने लायक हैं, भले ही उनसे अलगअलग निष्कर्ष निकलें।

क्या हम रामायण की बहुत ज़्यादा बारीकी से जांचपरख कर रहे हैं?
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोगों की उम्मीदें बहुत ज़्यादा हैं। फिल्म के पूरी तरह रिलीज़ होने से पहले ही, हर कास्टिंग चुनाव, विज़ुअल इफ़ेक्ट, कॉस्ट्यूम और अब संगीत के हर हिस्से को परखा जा रहा है। रिलीज़ और प्रचार के खर्चों को मिलाकर, दोनों भागों में कथित तौर पर 4,000 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है, जो लोगों की उत्सुकता को और बढ़ा देता है।

लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि यह जांचपरख ज़रूरत से ज़्यादा है? ज़रूरी नहीं। रामायण का सांस्कृतिक महत्व लोगों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि इसे किस तरह पेश किया जा रहा है। साथ ही, फिल्म के रिलीज़ होने से पहले ही उसके कुछ हिस्सों को देखकर पूरी फिल्म को जज करना, शायद इसके व्यापक विज़न के साथ न्याय न हो।

दोनों बातें सही हो सकती हैं: फिल्म निर्माताओं को उस कहानी की अहमियत समझनी चाहिए जिसे वे पेश कर रहे हैं, और दर्शकों को भी फिल्म के भीतर किए गए रचनात्मक विकल्पों को समझने के लिए थोड़ी गुंजाइश रखनी चाहिए।

फिलहाल, ‘मंगल रंग’ ने संगीत की मौलिकता, धार्मिक जुड़ाव और किसी प्रिय महाकाव्य के रूपांतरण से दर्शकों की उम्मीदों पर एक नई बहस छेड़ दी है। यह गाना फिल्म के लिए कितना कारगर साबित होता है, और फिल्म के संदर्भ में देखने पर इसकी आलोचना कितनी सही ठहरती है यह तो अंततः दर्शक ही तय करेंगे। रामायण: भाग 1 दुनिया भर में 5 नवंबर को रिलीज़ हो रही है।

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— The World Of Ramayana October 25, 2026