यूएई के बाद अब इराक भी ओपेक से बाहर निकलने की बात कर रहा है. इराक ने ऑयल कार्टेल से डिमांड की है कि अगर उसके प्रोडक्शन कोटा को नहीं बढ़ाया गया तो वो इस संगठन से बाहर हो जाएगा. वैसे तो इस खबर को लेकर पूरी दुनिया पिछले कुछ घंटों से काफी चर्चा हो चुकी है.

ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर इराक ओपेक से बाहर गया तो इंटरनेशनल क्रूड ऑयल मार्केट किस तरह से बदल जाएगा. अगर इराक हर महीने 4 मिलियल बैरल प्रतिदिन की जगह 7 मिलियन बैरल प्रतिदिन प्रोडक्शन करने लगेगा तो कच्चे तेल के दाम कितने आ जाएंगे?

खास बात तो ये है कि इराक की ये बगावत कोई आम नहीं होने वाली है. अगर ओपेक ने इराक की डिमांड को नहीं माना तो कच्चे तेल की कीमतें उस लेवल पर आ जाएंगी, जिसके बारे में ओपेक के मेंबर्स ने सोचा भी नहीं होगा. जानकारों की मानें तो अगर इराक ने अपनी मर्जी से प्रोडक्शन करना शुरू किया और इराकी तेल की सप्लाई बढ़ गई तो कच्चे तेल की कीमतें 50 से 55 डॉलर के बीच आ सकती हैं.

इसका मतलब है कि करंट लेवल से कच्चे तेल के दाम करीब 20 डॉलर यानी 25 से 30 फीसदी तक टूट सकते हैं. आइए विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इराक के ओपेक फ्री होने से कच्चे तेल बाजार के समीकरण किस तरह से बदल जाएंगे.

OPEC से बाहर निकलने की तैयारी इराक

इराक OPEC से एग्जिट क्यों चाहता है?

हालांकि बगदाद का अभी इस संगठन को छोड़ने का कोई तुरंत का प्लान नहीं है, लेकिन तेल मंत्रालय के प्रवक्ता सलीम अलरिकबी ने ब्लूमबर्ग को बताया कि इराक का मानना ​​है कि ओपेक को देश की प्रोडक्शन क्षमता और आर्थिक जरूरतों के हिसाब से अपनी प्रोडक्शन लिमिट बढ़ानी चाहिए. अलरिकबी ने कहा कि संगठन को इराक का प्रोडक्शन लेचन बढ़ाना चाहिए. नहीं तो, यह तय करना होगा कि OPEC में बने रहना है या इससे बाहर निकलना है.

ओपेक ओवरऑल प्रोडक्शन टारगेट तय करके और हर सदस्य देश को खास प्रोडक्शन कोटा देकर अपने मेंबर्स के बीच ऑयल प्रोडक्शन को कंट्रोल करता है. इन कोटा को ग्लोबल डिमांड और मार्केट की स्थितियों के आधार पर एडजस्ट किया जाता है. खबरों के मुताबिक, इराक इन्हीं कोटा से परेशान है.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, यह चेतावनी OPEC+ के अंदर प्रोडक्शन टारगेट्स को लेकर बढ़ते तनाव के बीच आई है और यह इस साल की शुरुआत में UAE के OPEC से अलग होने के बाद आई है, ताकि वह प्रोडक्शन की ज्यादा स्वतंत्र रणनीति अपना सके.

न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने रिपोर्ट दी है कि अगर बगदाद को दिए गए प्रोडक्शन कोटा में काफी बढ़ोतरी नहीं की जाती है, तो इराकी अधिकारी निजी तौर पर इस ग्रुप को छोड़ने की संभावना पर विचार कर सकते हैं. इराक के तेल मंत्रालय के एक सीनियर अधिकारी ने एजेंसी को बताया कि इराक की चिंताओं को “पूरी गंभीरता” से लिया जाना चाहिए.

अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि सऊदी अरब और ओपेक के अन्य सहयोगियों को इस मामले को पूरी गंभीरता से लेना चाहिए. ऐसा न होने पर, इराक सभी उपलब्ध ऑप्शंस पर विचार करने के लिए मजबूर होगा. हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि बाहर निकलना अभी सिर्फ विचार के दायरे में है, न कि कोई तय नीति. उन्होंने आगे कहा कि इस कदम के लिए अभी बहुत जल्दबाजी होगी.

इराक, जो OPEC का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और संगठन के पांच संस्थापक सदस्यों में से एक है, लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि मौजूदा उत्पादन सीमाएं उसकी उत्पादन क्षमता को नहीं दिखाती हैं.

2016 में OPEC+ के गठन के बाद से ही देश ने अक्सर ज़्यादा कोटा की मांग की है. उसका कहना है कि दशकों के संघर्ष और प्रतिबंधों से बर्बाद हुई इकोनॉमी को फिर से खड़ा करने के लिए उसे तेल से ज्यादा कमाई की जरूरत है. इसके अलावा, इराक के तेल मंत्रालय के एक अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि अमेरिकाईरान वॉर के कारण देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है और इस स्थिति से निपटने के लिए उसे ज्यादा तेल कोटा की जरूरत है.

यह ताजा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब ओपेक और उसके सहयोगी अगले साल के लिए उत्पादन बेसलाइन पर बातचीत कर रहे हैं. ब्लूमबर्ग ने कहा कि ग्रुप छोड़ने की इच्छा ज़ाहिर करना बगदाद की उस कोशिश का हिस्सा हो सकता है, जिसका मकसद बातचीत के दौरान ज्यादा फायदेमंद कोटा हासिल करना है.

रॉयटर्स ने मई में रिपोर्ट दी थी कि यूएई के हटने से पैदा हुई कमी को पूरा करने के लिए ग्रुप ने मिलकर तेल प्रोडक्शन का टारगेट 1,88,000 बैरल प्रति दिन बढ़ाने पर सहमति जताई थी. लेकिन साफ है कि यह बगदाद की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं था.

इराक क्यों बढ़ाना चाहता प्रोडक्शन?

यह विवाद UAE के मामले जैसा ही है, जो प्रोडक्शन कोटा पर असहमति के कारण OPEC से अलग हो गया था. अप्रैल में OPEC छोड़ने से पहले UAE की मुख्य शिकायत यह थी कि उसका प्रोडक्शन कोटा उसकी असल क्षमता के हिसाब से नहीं था. अबू धाबी ने तेल प्रोडक्शन बढ़ाने में भारी निवेश किया था और उसका तर्क था कि ओपेक की पाबंदियों की वजह से वह अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पा रहा था. यूएई के अधिकारी यह भी चाहते थे कि उन्हें अपने रिजर्व से कमाई करने के लिए ज्यादा छूट मिले, ताकि ग्लोबल एनर्जी ट्रांजिशन से तेल की लंबी अवधि की मांग कम होने से पहले वे इसका फायदा उठा सकें.

इराक भी अब ऐसा ही तर्क दे रहा है और कह रहा है कि उसका कोटा उसकी प्रोडक्शन क्षमता और आर्थिक जरूरतों के हिसाब से होना चाहिए. इराकी अधिकारियों ने बारबार कहा है कि दशकों तक चले वॉर, प्रतिबंधों, अस्थिरता और USईरान वॉर से हुए नुकसान के बाद अपनी इकोनॉमी को फिर से खड़ा करने और विकास कार्यों के लिए देश को ज़्यादा तेल से होने वाली कमाई की जरूरत है, जो सिर्फ तेल का प्रोडक्शन बढ़ाकर ही मिल सकती है.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इराक USईरान वॉर और स्ट्रेट से शिपिंग पर पड़े अस्थायी असर के कारण आई रुकावटों के बाद अपनी पूरी एक्सपोर्ट क्षमता को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रहा है. सरकारी प्रवक्ता हैदर अलअबूदी ने कहा कि इराक का लक्ष्य आने वाले सालों में तेल प्रोडक्शन को बढ़ाकर 7 मिलियन बैरल प्रति दिन करना है.

अलअबूदी ने रॉयटर्स को बताया कि इराक अपनी पूरी तेल एक्सपोर्ट क्षमता को फिर से हासिल करने के लिए काम कर रहा है और आने वाले सालों में तेल प्रोडक्शन को बढ़ाकर 7 मिलियन बैरल प्रति दिन करने का लक्ष्य रखता है.

इराक के एग्जिट से OPEC पर क्या असर पड़ेगा?

चेतावनी के बावजूद, इराकी अधिकारियों ने फिर से कहा है कि देश अभी के लिए ओपेक के साथ बना हुआ है और संगठन के नियमों के दायरे में रहकर काम करता रहेगा, साथ ही ज्यादा प्रोडक्शन कोटा पाने की कोशिश भी करेगा. फिर भी, अगर सबसे बुरा होता है और इराक बाहर निकल जाता है, तो यह OPEC के लिए एक बड़ा झटका होगा.

हाल के सालों में ग्लोबल ऑयल मार्केट पर OPEC का असर कमज़ोर हुआ है. इसकी वजहें हैं US शेल ऑपरेटरों और दूसरे नॉनOPEC उत्पादकों का बढ़ता प्रोडक्शन, हालिया ईरान विवाद और UAE का कार्टेल से बाहर निकलना.

ओपेक का असर इस बात से आता है कि वह अपने सदस्य देशों के बीच प्रोडक्शन लेवल में तालमेल बिठाकर ग्लोबल ऑयल की कीमतों को प्रभावित कर सकता है. मिलकर प्रोडक्शन बढ़ाकर या घटाकर, यह ग्रुप ग्लोबल एनर्जी मार्केट में सप्लाई और डिमांड के बीच संतुलन को प्रभावित कर सकता है.

हालांकि, यह असर तब कमज़ोर हो जाता है जब सदस्य देश OPEC कोटा से अलग होकर स्वतंत्र रूप से तेल का प्रोडक्शन करते हैं या संगठन को पूरी तरह छोड़ देते हैं, जिससे कुल सप्लाई को कंट्रोल करने की ग्रुप की क्षमता कम हो जाती है.

इराक के UAE की राह पर चलने की संभावना ऐसे समय में बनी है जब ईरान वॉर की वजह से बढ़ी तेल की कीमतें ज़्यादातर कम हो गई हैं. इससे पता चलता है कि पहले से ही अच्छी सप्लाई वाले मार्केट में उत्पादक प्रोडक्शन को फिर से शुरू करने के लिए कितने उत्सुक हैं. एनालिस्ट चेतावनी देते हैं कि OPEC के अंदर और बंटवारा होने से भविष्य में प्राइस वॉर का खतरा बढ़ सकता है.

इराक का बाहर निकलना खास तौर पर प्रतीकात्मक महत्व रखेगा, क्योंकि 1960 में बगदाद में संगठन की स्थापना के समय इराक OPEC के पांच संस्थापक सदस्यों में से एक था. इराक के ग्रुप का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक होने के नाते, उसके बाहर निकलने से ग्लोबल ऑयल प्रोडक्शन में OPEC की हिस्सेदारी भी कम हो जाएगी और ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर ग्रुप का असर और कमजोर हो जाएगा.

इराक के पास कितना है ऑयल रिजर्व?

  1. इराक के पास लगभग 145 अरब बैरल कच्चे तेल का प्रमाणित भंडार है, जो दुनिया में पांचवां सबसे बड़ा भंडार है और वैश्विक कुल भंडार का लगभग 8 फीसदी है. वेनेजुएला, सऊदी अरब, ईरान और कनाडा के बाद इराक का नंबर है.
  2. यह महत्वपूर्ण सप्लाई इराकी सरकार की निर्यात आय का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा है, जिसके मुख्य तेल क्षेत्र दक्षिणी बसरा क्षेत्र में केंद्रित हैं.
  3. भंडार का लगभग 70% 80% हिस्सा दक्षिणी इराक के विशाल तेल क्षेत्रों में स्थित है, जबकि 20 फीसदी उत्तर में किरकुक और मोसुल के पास है.
  4. मौजूदा उत्पादन स्तर पर, इराक का भंडार लगभग 90 से 375 वर्षों तक चल सकता है, जो तेल निकालने और खपत के आंकड़ों पर निर्भर करता है.
  5. इराक OPEC में कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जो प्रतिदिन लगभग 4 मिलियन बैरल का उत्पादन करता है.

तो 50 डॉलर पर आएगा कच्चा तेल?

अगर इराक ओपेक से बाहर निकलता है तो उसका असर सिर्फ ओपेक पर ही नहीं बल्कि पूरे ऑयल मार्केट में दिखाई देगा. केडिया एडवाइजरी के डायरेक्टर अजय केडिया कहते हैं कि अगर इराक स्वतंत्र रूप से ऑयल प्रोडक्शन करता है और कुछ समय में अपने प्रोडक्शन को 7 मिलियन प्रति बैरल के लेवल पर पहुंच जाता है तो कच्चे तेल की कीमतें धराशाई होती हुई दिखाई देंगी.

उन्होंने कहा कि अभी कई देशों को अपने ऑयल रिजर्व को भरना है, जोकि वॉर के दौरान खाली हो चुका है. इस रिजर्व को भरने के दौरान भी कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा लेवल से 20 डॉलर प्रति बैरल यानी 25 से 30 फीसदी तक की कमी देखने को मिल सकती है. इसका मतलब है कि कच्चे तेल की कीमतें 50 से 55 डॉलर प्रति बैरल से के बीच आ सकती हैं. जब चीन, अमेरिका और दूसरे देशों ऑयल रिजर्व की भरपाई हो जाएगी तो कच्चे तेल के दाम और भी कम होने सकते हैं.

मौजूदा समय में कच्चे तेल के दाम

अगर बात कच्चे तेल की कीमतों की करें तो काफी नीचे आ चुकी हैं. आंकड़ों को देखें मौजूदा समय में खाड़ी देशों का कच्चा तेल करीब डेढ़ फीसदी की तेजी के साथ 75 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. जबकि सुबह के समय 73 डॉलर प्रति बैरल से नीचे कारोबार कर रहा था. जोकि प्री वॉर लेवल था. वहीं दूसरी ओर अमेरिकी क्रूड के दाम करीब दो फीसदी की तेजी के साथ 72 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है. जबकि सुबह के समय अमेरिकी कच्चा तेल 70 डॉलर से नीचे आ गया था. जानकारों की मानें तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव जारी रह सकता है.