Moradabad News: मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े मामले में कमिश्नर कोर्ट में होने वाली सुनवाई टल गई है. कांवड़ यात्रा के चलते अधिवक्ताओं के कार्य स्थगित रहने और वादकारियों के कोर्ट नहीं पहुंच पाने के कारण सुनवाई आगे बढ़ा दी गई. अब मामले की अगली सुनवाई 13 अगस्त को होगी. इस बीच यूनिवर्सिटी की ओर से अधिवक्ता जुनैद अयाज ने रामपुर विकास प्राधिकरण की ओर से जारी शोकॉज नोटिस और कार्रवाई के आधार पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

कांवड़ यात्रा के चलते टली सुनवाई

यूनिवर्सिटी के अधिवक्ता जुनैद अयाज ने बताया कि कोर्ट में मामले से संबंधित रिकॉर्ड भी समन किया गया था और रिपोर्ट मांगी गई थी. हालांकि, रिपोर्ट किन बिंदुओं पर पेश की जानी है, इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी. कांवड़ यात्रा के कारण अधिवक्ताओं के कार्य स्थगित रहने और वादकारियों के कोर्ट नहीं पहुंच पाने के चलते सुनवाई नहीं हो सकी. अब कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 13 अगस्त की तारीख तय की है.

RDA के शोकॉज नोटिस पर उठाए सवाल

अधिवक्ता जुनैद अयाज ने RDA के शोकॉज नोटिस को गलत और समय से पहले की गई कार्रवाई बताया है. उनका कहना है कि जिस क्षेत्र में जौहर यूनिवर्सिटी स्थित है, वह 27 सितंबर 2024 को RDA के अंतर्गत आया है. उनके मुताबिक, किसी निर्माण के खिलाफ कार्रवाई से पहले प्राधिकरण को उस क्षेत्र के लिए मास्टर प्लान, जोनल डेवलपमेंट प्लान, बिल्डिंग बायलॉज और निर्माण से जुड़े स्पष्ट नियम तैयार करने चाहिए. उनका दावा है कि जब क्षेत्र के लिए जरूरी नियम और मानक ही स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं हैं तो उनके आधार पर नोटिस जारी करना उचित नहीं है.

ग्रीन बेल्ट और लैंड यूज पर भी दी सफाई

यूनिवर्सिटी के अधिवक्ता ने ग्रीन बेल्ट और जमीन के इस्तेमाल को लेकर लगाए जा रहे सवालों पर भी अपना पक्ष रखा. उनका कहना है कि RDA ने अपने नोटिस में खुद स्वीकार किया है कि ग्रीन बेल्ट का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है. उनके अनुसार, संबंधित भूमि के रिकॉर्ड में लैंड यूज के तौर पर सामुदायिक सुविधाएं और शिक्षा दर्ज है. उनका तर्क है कि यूनिवर्सिटी एक शैक्षणिक संस्थान है, इसलिए वहां शिक्षा से संबंधित निर्माण को लैंड यूज के अनुरूप माना जाना चाहिए.

पुराने निर्माण को लेकर भी रखा पक्ष

जौहर यूनिवर्सिटी के अधिवक्ता ने जिला पंचायत की नियमावली को लेकर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि जिला पंचायत की संबंधित नियमावली 7 नवंबर 2012 से लागू हुई थी. ऐसे में उनका दावा है कि इससे पहले किए गए निर्माण पर बाद में लागू हुई नियमावली को आधार बनाकर कार्रवाई नहीं की जा सकती. उन्होंने बताया कि PWD के अधिशासी अभियंता की ओर से गूगल अर्थ के माध्यम से की गई जांच में यह बात सामने आई है कि 2008 तक यूनिवर्सिटी के 14 ब्लॉक बन चुके थे. इसके बाद 2009 तक निर्माणाधीन अन्य भवनों को मिलाकर कुल 27 ब्लॉक से संबंधित रिकॉर्ड शासन के पास पहले से मौजूद होने का दावा किया गया है. इसी रिकॉर्ड को कोर्ट के सामने पेश कराने के लिए समन की मांग की गई है.

RDA के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल

अधिवक्ता जुनैद अयाज ने RDA के क्षेत्राधिकार पर भी आपत्ति जताई है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। उनका कहना है कि यह क्षेत्र पहले जिला पंचायत के अधीन था और बाद में RDA के क्षेत्र में आया. उनके मुताबिक, संबंधित क्षेत्र को उत्तर प्रदेश रेगुलेशन ऑफ बिल्डिंग ऑपरेशंस एक्ट, 1958 के तहत विनियमित क्षेत्र घोषित किए जाने की स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि RDA की ओर से सीधे ध्वस्तीकरण की कार्रवाई किस आधार पर की जा रही है.

डिमॉलिशन से पहले नियमितीकरण का विकल्प

अधिवक्ता का कहना है कि किसी निर्माण को गिराना अंतिम कार्रवाई होनी चाहिए. यदि निर्माण में कोई नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो पहले जुर्माने या शमनीय शुल्क के जरिए उसे नियमित करने की संभावना पर विचार किया जाना चाहिए. उन्होंने कोर्ट में RDA से यूपी अर्बन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट, 1973 के तहत स्वीकृत मास्टर प्लान और संबंधित बायलॉज पेश करने की मांग की है. अब इस मामले में अगली सुनवाई 13 अगस्त को होगी, जहां कोर्ट के सामने दोनों पक्षों के तर्क और संबंधित रिकॉर्ड रखे जाने की उम्मीद है.