नॉर्मल सिगरेट का धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर का एक प्रमुख कारण है. जैसेजैसे सामान्य सिगरेट पीने वालों की संख्या कम हो रही है, वैसेवैसे ईसिगरेट का चलन तेजी से बढ़ा है. ईसिगरेट को अक्सर सामान्य सिगरेट की तुलना में ज्यादा सेफ ऑप्शन और स्मोकिंग छोड़ने का प्रभावी तरीका बताकर प्रोमोट किया जाता है. लेकिन इन दावों के समर्थन में साइंटिफिक प्रूफ अभी भी पर्याप्त और मजबूत नहीं हैं. खासतौर से ईसिगरेट के लंबे समय तक उपयोग से फेफड़ों पर होने वाले प्रभावों और फेफड़ों के कैंसर के जोखिम को लेकर अभी भी व्यापक शोध जारी है.

अब तक किए गए कुछ रिसर्च से संकेत मिलता है कि ईसिगरेट का उपयोग फेफड़ों के कैंसर के खतरे को बढ़ा सकता है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। यह जोखिम उन लोगों में और अधिक हो सकता है जो ईसिगरेट के साथसाथ सामान्य सिगरेट का भी सेवन करते हैं. ऐसे लोगों को “ड्यूल यूज़र” कहा जाता है.

एक्सपर्ट ने क्या कहा

डॉ. शिबा कल्याण बिस्वाल बताते हैं कि सिगरेट से निकलने वाले वाष्प में कई हानिकारक रसायन मौजूद होते हैं. इनमें ऐसे तत्व शामिल हैं जो शरीर की कोशिकाओं और डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं. पशुओं पर किए गए अध्ययनों में पाया गया कि करीब एक साल तक ईसिगरेट के वाष्प के कॉन्टेक्ट में रहने वाले चूहों में फेफड़ों के कैंसर का एक प्रकार विकसित हुआ.

इसके अलावा, ईसिगरेट के तरल पदार्थों में यूज प्रोपिलीन ग्लाइकोल और बेंजोइक एसिड जैसे तत्व सेल्स में जलन, क्षति और फेफड़ों में सूजन पैदा कर सकते हैं.

शोध यह भी दर्शाते हैं कि पहले धूम्रपान कर चुके लोगों में ईसिगरेट का उपयोग कैंसर के जोखिम को और बढ़ा सकता है. इसलिए फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए मरीज का वेपिंग इतिहास भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.

फेफड़ों की बीमारी के मामले बढ़े

बीते कुछ सालों में वेपिंग से संबंधित गंभीर फेफड़ों की बीमारी के कई मामले भी सामने आए हैं, जिनमें मरीजों को सांस लेने में गंभीर तकलीफ के कारण अस्पताल में भर्ती करना पड़ा. इससे यह स्पष्ट होता है कि वेपिंग के जोखिम अप्रत्याशित हो सकते हैं, विशेषकर तब जब उत्पादों की गुणवत्ता का उचित नियमन न हो या उनमें अज्ञात रसायनों का उपयोग किया गया हो.

स्मोकिंग छोड़ने के लिए ईसिगरेट पीना

धूम्रपान छोड़ने के लिए ईसिगरेट अपनाने वाले कई लोग कहीं न कहीं नॉर्मल सिगरेट और ईसिगरेट दोनों का सेवन करने लगते हैं. वो स्मोकिंग को छोड़ने के बजाय खुद को और बड़े खतरे में डाल देते हैं. इस वजह से उनकी निकोटीन पर निर्भरता बनी रहती है और वे अधिक हानिकारक रसायनों के संपर्क में आते हैं.

ये सिचुएशन कई दशक पहले की उस गलत धारणा की याद दिलाती है, जब फिल्टर वाली सिगरेट को ज्यादा सेफ बताकर प्रचारित किया गया था, जबकि बाद में ये पाया गया कि वे भी उतनी ही हानिकारक थीं.