Best Solar Panel: हर महीने आने वाले बिजली के भारीभरकम बिल और अघोषित कटौतियों ने आम आदमी का बजट बिगाड़ कर रख दिया है. इस समस्या से स्थायी निजात पाने के लिए आजकल बड़ी संख्या में लोग अपने घरों की छतों पर सोलर पैनल लगवाने की ओर रुख कर रहे हैं. हालांकि, जब आप बाजार में सोलर पैनल खरीदने जाते हैं, तो कई तरह के विकल्प सामने आते हैं. एक उपभोक्ता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि आखिर उसकी छत के लिए कौनसा पैनल सबसे बेहतरीन रहेगा, जो कम जगह में सबसे ज्यादा बिजली पैदा कर सके. चूंकि यह एक लंबा निवेश है, इसलिए सही जानकारी के साथ सही निर्णय लेना बेहद जरूरी है. आइए, सोलर पैनल के इस पूरे गणित को समझते हैं ताकि आप सही फैसला ले सकें.

छत के लिए क्या है सही?

अगर आप सोलर पैनल लगवाने जा रहे हैं, तो आपको मुख्य रूप से बाजार में तीन प्रकार के पैनल मिलेंगे. इनमें मोनोक्रिस्टलाइन, पॉलीक्रिस्टलाइन और थिनफिल्म पैनल शामिल हैं. मोनोक्रिस्टलाइन पैनल को एक ही सिलिकॉन क्रिस्टल से तैयार किया जाता है, जिसकी वजह से इनका रंग गहरा काला होता है. ये दिखने में काफी प्रीमियम लगते हैं. वहीं, पॉलीक्रिस्टलाइन पैनल को बनाने के लिए कई सिलिकॉन टुकड़ों को पिघलाकर एक साथ जोड़ा जाता है, जिससे इनका रंग हल्का नीला दिखाई देता है. तीसरे प्रकार यानी थिनफिल्म पैनल का इस्तेमाल आमतौर पर बड़े व्यावसायिक प्रोजेक्ट्स में होता है. घरों की छतों के लिए इन्हें अच्छा विकल्प नहीं माना जाता, क्योंकि इन्हें लगाने के लिए बहुत ज्यादा जगह की जरूरत होती है.

कौन बनाएगा ज्यादा बिजली

सोलर पैनल की गुणवत्ता इस बात से मापी जाती है कि वह सूरज की रोशनी को कितनी अच्छी तरह बिजली में बदल पाता है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। इसे तकनीकी भाषा में ‘एफिशिएंसी’ कहते हैं. जब बात सबसे ज्यादा बिजली बनाने की आती है, तो मोनोक्रिस्टलाइन पैनल साफ तौर पर बाजी मार लेते हैं. इनकी एफिशिएंसी आमतौर पर 19 से 24 प्रतिशत के बीच होती है. इसके विपरीत, पॉलीक्रिस्टलाइन पैनल की एफिशिएंसी 15 से 17 प्रतिशत के आसपास ही सिमट जाती है. इसका सीधा सा मतलब यह है कि अगर आपकी छत पर सीमित जगह है, तो समान जगह में मोनोक्रिस्टलाइन पैनल पॉलीक्रिस्टलाइन के मुकाबले कहीं ज्यादा बिजली जनरेट करेगा.

बनावट से तय होती है पावर

आखिर मोनोक्रिस्टलाइन पैनल इतनी ज्यादा बिजली कैसे बनाता है? इसका जवाब इसकी आंतरिक बनावट में छिपा है. यह पैनल एक साबुत सिलिकॉन क्रिस्टल को काटकर बनाया जाता है. इस वजह से इसके भीतर इलेक्ट्रॉन्स बहुत आसानी से एक समान दिशा में बहते हैं और इस पूरी प्रक्रिया में ऊर्जा का नुकसान न के बराबर होता है. दूसरी तरफ, पॉलीक्रिस्टलाइन पैनल में कई छोटेछोटे क्रिस्टल्स आपस में जुड़े होते हैं. इन क्रिस्टल्स के बीच की सीमाओं पर इलेक्ट्रॉन्स के बहाव में रुकावट आती है, जिससे बिजली बनाने की इसकी क्षमता थोड़ी कम रह जाती है.

चिलचिलाती धूप में भी बंपर बिजली

आजकल बाजार में मोनोक्रिस्टलाइन पैनल में भी कई बड़े एडवांसमेंट आ चुके हैं. अब टॉपकॉन और हेट्रोजंक्शन जैसी नई तकनीक वाले आधुनिक पैनल उपलब्ध हैं. ये पैनल सामान्य मोनोक्रिस्टलाइन के मुकाबले भी ज्यादा बिजली पैदा करते हैं, जिससे इनकी एफिशिएंसी 22 से 24 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. सबसे बड़ी खासियत यह है कि भारत जैसे गर्म देश में जहां गर्मियों में तापमान बहुत अधिक हो जाता है, वहां भी ये पैनल अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करते हैं. अधिक गर्मी में भी इनकी परफॉर्मेंस गिरती नहीं है. इसलिए, अगर आपका बजट थोड़ी इजाजत देता है, तो इन आधुनिक तकनीक वाले पैनल को चुनना बेहद समझदारी भरा कदम साबित हो सकता है.