एटीएम से नहीं निकले थे 10 हजार, 9 साल बाद बैंक को भुगतना पड़ा 3.5 लाख का हर्जाना!


सूरत। डिजिटल ट्रांजेक्शन के दौर में तकनीकी खामी कभी-कभी बैंकों पर भारी पड़ जाती है। सूरत के एक ग्राहक के साथ हुई एटीएम की गड़बड़ी बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) के लिए इतनी महंगी साबित हुई कि अब उसे मूल राशि से लगभग 30 गुना ज्यादा हर्जाना भरना पड़ रहा है। 9 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कंज्यूमर कोर्ट ने बैंक की लापरवाही पर सख्त रुख अपनाते हुए फैसला सुनाया है।

10 हजार की निकासी और 3,288 दिनों का इंतजार
मामला फरवरी 2017 का है, जब एक ग्राहक ने सूरत के उधना इलाके में एसबीआई (SBI) के एटीएम से अपने बैंक ऑफ बड़ौदा खाते से 10,000 रुपये निकालने की कोशिश की। मशीन से न तो पैसे निकले और न ही कोई रसीद मिली, लेकिन ग्राहक के मोबाइल पर राशि कटने का मैसेज आ गया।

ग्राहक ने 21 फरवरी 2017 को डुम्भल ब्रांच में लिखित शिकायत दी, कई ईमेल किए और यहां तक कि सीसीटीवी फुटेज के लिए आरटीआई (RTI) का भी सहारा लिया। ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। बैंक ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि ट्रांजेक्शन सफल दिख रहा है और एटीएम दूसरे बैंक का था। हार मानकर ग्राहक ने 20 दिसंबर 2017 को कंज्यूमर फोरम का दरवाजा खटखटाया।

आरबीआई नियमों की अनदेखी पड़ी भारी
सुनवाई के दौरान कंज्यूमर कमीशन ने बैंक की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरबीआई (RBI) के नियमों के अनुसार, ट्रांजेक्शन फेल होने पर बैंक को 5 दिनों के भीतर पैसा वापस करना चाहिए था। बैंक ने न तो पैसा लौटाया और न ही ट्रांजेक्शन का कोई ठोस सबूत पेश किया। कोर्ट ने पाया कि 26 फरवरी 2026 तक रिफंड में कुल 3,288 दिनों की देरी हुई है।

जुर्माने का गणित: ₹10,000 के बदले ₹3.5 लाख
कंज्यूमर कमीशन ने बैंक ऑफ बड़ौदा को निम्नलिखित भुगतान करने का आदेश दिया…

मूल राशि: ₹10,000 (9% वार्षिक ब्याज के साथ)।
विलंब शुल्क: ₹100 प्रति दिन के हिसाब से (3,288 दिनों के लिए) कुल ₹3,28,800।
मानसिक प्रताड़ना: ₹3,000 का अतिरिक्त हर्जाना।
कानूनी खर्च: ₹2,000 अदालती कार्यवाही के लिए।

इस तरह 10 हजार रुपये की छोटी सी रकम के लिए बैंक को अब करीब 3.5 लाख रुपये चुकाने होंगे। यह फैसला उन ग्राहकों के लिए बड़ी जीत है जो बैंकिंग सेवाओं में तकनीकी खामियों का शिकार होते हैं।

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