सैनिक पति कोमा में, पत्नी को IVF के जरिए मां बनने के लिए स्पर्म लेने की मिली इजाजत!


नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय के आईवीएफ संबंधी फैसले के बाद कोमा में पड़े सैनिक की पत्नी का मां बनने का सपना कैसे हो सकेगा पूरा, आइए जानें। दिल्ली हाईकोर्ट ने लंबे समय से कोमा की स्थिति में पड़े भारतीय सेना के एक जवान के स्पर्म (शुक्राणु) निकालने और उसे सुरक्षित रखने की सशर्त अनुमति सैनिक की पत्नी को दे दी है।

महिला स्पर्म निकालने की इजाजत कोर्ट से मांगी थी क्योंकि उनके पति 2025 से कोमा में जीवन रक्षक उपकरणों पर हैं। महिला ने यह भावुक इच्छा जताई थी कि वह भविष्य में अपने पति के स्पर्म के जरिए इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) उपचार के माध्यम से मां बनना चाहती है। यह मामला सामने आने के बाद लोगों के मन में यह जानने की इच्छा उठने लगी कि भला यह कैसे संभव है।

डॉक्टर से समझें कैसे होगा यह संभव

डॉ. नीलम सूरी, वरिष्ठ सलाहकार, प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ, इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली के अनुसार, “कोमा में पड़े व्यक्ति से स्पर्म निकालने की प्रक्रिया को अक्सर ‘पेरिमॉर्टेम स्पर्म रिट्रीवल’ (मृत्यु से पहले स्पर्म लेना) कहा जाता है। यह तकनीकी रूप से संभव है। इसे इलेक्ट्रिक स्टिमुलेशन या सर्जरी के जरिए किया जा सकता है। रिसर्च के अनुसार लगभग 100% मामलों में स्पर्म निकाला जा सकता है। वहीं 80–90% मामलों में जीवित (viable) स्पर्म लेना संभव होता है।

कोमा में पड़े मरीज के स्पर्म निकालने के तरीके

नॉन-इनवेसिव तरीका

इसमें अगर मरीज का स्पाइनल रिफ्लेक्स मौजूद हो तो इलेक्ट्रिक स्टिमुलेशन के जरिए यह प्रक्रिया पूरी कराई जा सकती है।

सर्जिकल तरीका (TESA)

वहीं अगर नॉन-इनवेसिव तरीका काम न करे तो टेस्टिकुलर स्पर्म एस्पिरेशन (TESA) नामक की प्रोसेस होती है। इसमें बारीक सुई से सीधे अंडकोष से स्पर्म निकाला जाता है।

स्पर्म को निकालने के बाद क्या होता है, यह भी जानें

निकाले गए स्पर्म को क्रायोप्रिजर्व (फ्रीज) किया जाता है। इस बाद में लैब में अंडाणु के साथ निषेचन (fertilisation) किया जाता है। फिर तैयार भ्रूण (एंब्रियो) को महिला के गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है। बता दें कि स्पर्म फ्रीज करने की तकनीक 1953 से उपयोग में है। यह सहायक प्रजनन तकनीकों में सुरक्षित और मानकीकृत प्रक्रिया मानी जाती है।

मरीज अगर कोमा में है तो उसके स्पर्म पर पड़ता है ऐसा असर

विशेषज्ञों के अनुसार अगर कोई व्यक्ति कोमा में है तो ऐसा नहीं है कि उसके स्पर्म की गुणवत्ता खराब ही होगी। अगर स्पर्म स्वस्थ हैं तो उन्हें फ्रीज किया जा सकता है। स्पर्म को लगभग एक दशक तक सुरक्षित रह सकता है। लेकिन अगर मरीज कई दवाइयों का सेवन कर रहा हो या फिर एंटीबायोटिक्स या लाइफ सपोर्ट उपचार ले रहा हो तो ऐसी स्थिति में स्पर्म की गुणवत्ता और संख्या असर पड़ सकता है।

ऐसी हालात में ये हो सकती हैं दिक्कतें

इस प्रक्रिया में गर्भधारण से जुड़े जोखिम

स्पर्म निकालते समय यदि पिता के शरीर में कई दवाइयां मौजूद हों, तो उनका अप्रत्यक्ष प्रभाव स्पर्म की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। ऐसे में निषेचन हो जाने के बाद भी आगे की प्रक्रिया अनिश्चित रह सकती है। भ्रूण का सही तरीके से विकसित होना और गर्भाशय में सफलतापूर्वक स्थापित होना (इम्प्लांटेशन) जरूरी है। यह हमेशा सफल नहीं होता है। इस वजह से लिए अतिरिक्त निगरानी या जेनेटिक जांच की आवश्यकता पड़ सकती है।

ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *