रजिस्ट्रेशन विवाद: खड़गे के सवाल, भागवत का जवाब, 1950 में सरकार को सौंपे RSS के संविधान में क्या लिखा है?​

News Just Abhi राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इन दिनों सुर्खियों में है. असल में कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खड़गे ने RSS के रजिस्ट्रेशन और फंडिंग जैसी बातों पर सवाल उठाए हैं. इसके जवाब में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस कोई गुप्त संगठन नहीं है. साल 1950 में सरकार को संघ का लिखित संविधान सौंपा गया था. आइए, इसी बहाने जानते हैं कि संघ ने साल 1950 में सरकार को जो संविधान सौंपा था, उसमें क्या है? संघ पर कबकब सवाल उठे? कोर्ट ने क्याक्या कहा? संघ परिवार कैसे काम करता है? नीचे से ऊपर तक का ढांचा कैसा है? गुरु दक्षिणा कार्यक्रम कैसे संचालित होता है?

रजिस्ट्रेशन विवाद: खड़गे के सवाल, भागवत का जवाब, 1950 में सरकार को सौंपे RSS के संविधान में क्या लिखा है?​

संघ प्रमुख मोहन भागवत के दावे के मुताबिक संघ का लिखित संविधान सरकार के पास है. लेकिन आम आदमी के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि उस संविधान में क्या है? यह डाक्यूमेंट पब्लिक डोमेन में नहीं है लेकिन संघ पदाधिकारियों से हुई बातचीत में कुछ ठोस बातें जरूर पता चलती हैं, जो संघ जैसे कैडरआधारित संगठन पर प्रकाश डालते हैं.

1 उद्देश्य और काम का दायरा: संघ खुद को सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठन बताता है. ऐसे दस्तावेज़ में लक्ष्य अक्सर चरित्र निर्माण,अनुशासन, सेवा और समाजएकता जैसी बातें होती हैं. भाषा औपचारिक है.

2 सदस्यता और अनुशासन: कौन स्वयंसेवक है? कैसे जुड़ता है? ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। किस तरह का आचरण अपेक्षित है? अनुशासन तोड़ने पर क्या प्रक्रिया होगी? यह हिस्सा संगठन को एक जैसा काम करने में मदद करता है.

3 संगठनात्मक पद और निर्णयप्रक्रिया: लिखित नियम यह बताते हैं कि सबसे ऊपर नेतृत्व कैसे तय होता है. जिम्मेदारियां किस स्तर पर बंटी हैं. फैसले कौनसी बैठकों, समितियों में होते हैं. नीचे की इकाइयों की जवाबदेही किसे है.

4 वित्त और आंतरिक व्यवस्था: दान किस सिद्धांत पर लिया जाता है? कौन रखरखाव करता है? खर्च की अनुमति किस स्तर पर होती है? ऐसे नियम संगठन चलाने के लिए जरूरी होते हैं.

संघ प्रमुख मोहन भागवत. फोटो: PTI

संघ पर कबकब सवाल उठे? अदालतकानून के स्तर पर क्या कहा गया?

आरएसएस के इतिहास में प्रतिबंध और अदालती विवाद काफी चर्चा में रहे हैं. उपलब्ध तथ्य कहते हैं कि संगठन पर अब तक तीन बार प्रतिबंध लगाए गए हैं. हर बार अदालती हस्तक्षेप या कानूनी प्रक्रियाओं के बाद इन्हें हटाया गया.

पहला प्रतिबंध : गांधी जी की हत्या के बाद

  • परिस्थितियां: 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था. आरोप लगा था कि संघ की विचारधारा ने नफरत का माहौल बनाया जिससे यह घटना हुई.
  • कोर्ट और सरकार का रुख: संघ ने इस प्रतिबंध को चुनौती दी. अंततः 11 जुलाई 1949 को प्रतिबंध हटा लिया गया. सरकार ने तब स्पष्ट किया था कि संघ के खिलाफ हत्या की साजिश के सीधे सबूत नहीं मिले हैं. हालांकि, इसके बदले संघ को अपना लिखित संविधान सरकार को सौंपना पड़ा था, जिसकी चर्चा हाल ही में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी की है.

समयसमय पर कोर्ट ने संघ पर लगे आरोपों पर टिप्पणी की. फोटो: PTI

दूसरा प्रतिबंध : आपातकाल के दौरान

  • परिस्थितियां: तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब देश में आपातकाल लगाया, तो विपक्षी नेताओं के साथसाथ आरएसएस पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया. इसे लोकतंत्र के लिए खतरा और अशांति फैलाने वाला संगठन बताया गया था. हज़ारों स्वयंसेवक जेलों में डाले गए.
  • कोर्ट का रुख: 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने पर यह प्रतिबंध हटा. अदालतों ने बाद में कई मामलों में माना कि राजनीतिक विरोध के कारण यह कार्रवाई की गई थी.

तीसरा प्रतिबंध : बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद

  • परिस्थितियां: 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगाया.
  • कोर्ट का फैसला: यह मामला जस्टिस पी.के. बाहरी ट्रिब्यूनल के पास गया. साल 1993 में इस ट्रिब्यूनल ने प्रतिबंध को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि सरकार के पास संघ पर प्रतिबंध लगाने के लिए पर्याप्त सबूत और आधार नहीं हैं. कोर्ट ने माना कि किसी संगठन को केवल इसलिए प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके कुछ सदस्यों ने किसी घटना में भाग लिया है.

RSS सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले. फोटो: PTI

कोर्ट ने संघ के बारे में क्याक्या कहा?

संघ पर समयसमय पर लगने वाले आरोपों के बीच विभिन्न उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं.

1 सरकारी कर्मचारियों का संघ में जाना

अक्सर सवाल उठता था कि क्या सरकारी कर्मचारी संघ की शाखा में जा सकते हैं? कई राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा के हाईकोर्ट्स ने अपने फैसलों में संघ को केवल एक सांस्कृतिक संगठन माना है. अदालतों ने कहा है कि संघ की गतिविधियों में भाग लेना किसी कर्मचारी के लिए राजनीतिक गतिविधि नहीं मानी जा सकती, जब तक संगठन को अवैध घोषित न किया गया हो.

2 पंजीकरण और आयकर

हाल के विवादों में पटना हाईकोर्ट के एक फैसले का उल्लेख किया जाता है, जिसमें ‘गुरु दक्षिणा’ और म्युचुअलिटी के सिद्धांत पर चर्चा हुई थी. कोर्ट ने माना था कि यदि सदस्य अपने ही संगठन को स्वेच्छा से योगदान देते हैं और वह पैसा बाहर से नहीं आ रहा, तो वह आय की श्रेणी में नहीं आता.

3 अभिव्यक्ति की आजादी

मद्रास उच्च न्यायालय ने साल 2023 में संघ को शांतिपूर्ण मार्च निकालने की अनुमति देते हुए कहा था कि प्रजातंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और सभा करना मौलिक अधिकार है. कोई भी राज्य इसे बिना ठोस सुरक्षा कारणों के नहीं रोक सकता.

संघ पर बारबार उठने वाले सवाल

  1. पंजीकरण: आलोचक सवाल पूछते हैं कि संघ एक पंजीकृत संस्था क्यों नहीं है? संघ का तर्क रहता है कि वह एक स्वैच्छिक सांस्कृतिक संगठन है और देश के कानून में हर संगठन के लिए पंजीकरण अनिवार्य नहीं है.
  2. पारदर्शिता और फंड: गुरु दक्षिणा की राशि का हिसाबकिताब सार्वजनिक न करने पर भी सवाल उठते रहे हैं.
  3. विचारधारा: संघ पर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को लेकर सांप्रदायिक होने के आरोप लगते हैं, जिसे संघ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में परिभाषित करता है.

RSS परिवार कैसे काम करता है?

आरएसएस का ढांचा कैडर आधारित है. इसकी सबसे छोटी इकाई शाखा होती है और सबसे ऊपर सरसंघचालक का पद माना जाता है.

  • शाखा: यह संघ की मूल इकाई है. प्रतिदिन या साप्ताहिक बैठकें होती हैं. खेल, व्यायाम, बौद्धिक चर्चा और संगठनात्मक गतिविधियां होती हैं. स्वयंसेवकों का पहला संपर्क यहीं से होता है.
  • मंडल: कई शाखाओं को मिलाकर मंडल बनता है. स्थानीय स्तर पर कार्यक्रमों का समन्वय करता है.
  • नगर / खंड: मंडलों के ऊपर नगर या खंड इकाई होती है. शहर या बड़े ग्रामीण क्षेत्र की गतिविधियों का संचालन करती है.
  • जिला: जिले के स्तर पर संगठनात्मक कार्यों की निगरानी. प्रशिक्षण, अभियान और विस्तार की जिम्मेदारी.
  • विभाग: कई जिलों को मिलाकर विभाग बनता है. क्षेत्रीय समन्वय और कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शन का काम यहीं से होता है.
  • प्रांत: राज्य या राज्य के बड़े हिस्से के बराबर संगठनात्मक इकाई. प्रांत प्रचारक और अन्य पदाधिकारी यहां काम करते हैं.
  • क्षेत्र: कई प्रांतों को मिलाकर क्षेत्र बनता है. राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं को प्रांतों तक पहुंचाने का काम.
  • अखिल भारतीय स्तर: संघ का सर्वोच्च संगठनात्मक स्तर पर अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा और अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल हैं.
  • सरकार्यवाह: यह संघ का प्रमुख कार्यकारी पद. संगठन के दैनिक संचालन और नीतियों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर होती है.
  • सरसंघचालक: यह संघ का सर्वोच्च मार्गदर्शक पद है. वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत हैं. वैचारिक दिशा और दीर्घकालिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं.

प्रचारक व्यवस्था क्या है?

संघ की विशेष पहचान उसकी प्रचारक व्यवस्था है. प्रचारक पूर्णकालिक कार्यकर्ता होते हैं. उन्हें विभिन्न क्षेत्रों और संगठनों में भेजा जाता है. संगठन विस्तार, प्रशिक्षण और समन्वय की जिम्मेदारी निभाते हैं.

संघ की विशेष पहचान उसकी प्रचारक व्यवस्था है. फोटो: PTI

गुरु दक्षिणा मसला क्या है और कैसे लेतेदेते हैं?

गुरु दक्षिणा संघ की अंदरूनी परंपरा मानी जाती है. इसे अक्सर स्वैच्छिक योगदान के रूप में बताया जाता है. संघ की परंपरा में गुरु के रूप में भगवा ध्वज को मानने की बात कही जाती है. इसी भाव से साल में एक समय योगदान दिया जाता है. व्यवहार में यह दान एक योगदान की तरह ही होता है. स्वयसेवक अपनी क्षमता के अनुसार देते हैं. संग्रह स्थानीय इकाई के जरिए होता है. यह आयोजन साल में एक बार देश भर में होते हैं. कोई भी इस आयोजन को संघ की अनुमति से कर सकता है.

फिर विवाद क्यों होता है?

विवाद आम तौर पर तीन सवालों पर होता है. पैसा आता कहां से है? खर्च कैसे होता है? क्या यह टैक्स एवं कानूनी निगरानी में आता है?

इस तरह कहा जा सकता है कि रजिस्ट्रेशन का सवाल दरअसल कानूनी ढांचे और पारदर्शिता की अपेक्षा के बीच की बहस है. संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया है कि संघ खुलकर काम करता है और सरकार को उसका लिखित संविधान पहले ही दिया जा चुका है. दूसरी तरफ सवाल उठाने वालों का तर्क है कि इतने बड़े संगठन को भी वही जवाबदेही मानक अपनाने चाहिए जो अन्य संस्थाएं अपनाती हैं. यही कारण है कि यह मामला सुर्खियों में है.

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