News Just Abhi अपने परिवार के राहुल गांधी पहले सदस्य हैं, जिनके समय में केंद्र में लगातार तीसरी बार कांग्रेस विपक्ष में हैं. पंडित जवाहर लाल नेहरू 1964 में निधन तक सत्ता में रहें. इंदिरा गांधी ने 1977 की इकलौती हार का सामना किया. अगले 1980 के चुनाव में उनकी वापसी हुई. राजीव गांधी 1989 में सत्ता से बाहर हुए. 1991 में कांग्रेस फिर से सत्ता में वापसी हुई. हालांकि चुनाव नतीजों के पहले ही उनके दुःखद अंत के कारण पी.वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने. इंदिरा जी और राजीव की स्थिति इस मामले में भिन्न रही कि उन्हें सत्ता से बाहर करने वाले प्रतिद्वंदी अगले मुकाबले के पहले बिखर गए. राहुल गांधी के सामने चुनौती इस लिए और कठिन है क्योंकि उनके प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र मोदी और भाजपा हर मुकाबले में पिछले के मुकाबले अधिक शक्ति और विस्तार के बीच सामने होते हैं. जन्मदिन के मौके पर लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी के राजनीतिक सफ़र पर एक नज़र.

2004 में राहुल गांधी का संसदीय राजनीति में प्रवेश कांग्रेस के लिए शुभ साबित हुआ था. इस चुनाव में राहुल गांधी पहली बार अमेठी से लोकसभा के लिए चुने गए थे. तीन लोकसभा चुनावों के अंतराल पर इसी चुनाव में कांग्रेस को यू.पी.ए.1 की सरकार की अगुवाई का मौका मिला था. 2009 में कांग्रेस ने एक बार फिर बेहतर प्रदर्शन किया. जीत के बाद भी सोनिया गांधी प्रधानमंत्री पद की पेशकश ठुकरा चुकी थीं. राहुल गांधी यह जगह ले सकते थे. लेकिन परिवार और राहुल का फैसला डॉक्टर मनमोहन सिंह के पक्ष में रहा.
असलियत में यू.पी.ए. सरकार के दस साल के कार्यकाल में राहुल कोई भी सीधी जिम्मेदारी लेने से बचते रहे. लोकसभा के अपने पहले कार्यकाल के कुछ वर्षों में उन्होंने खुद को अमेठी रायबरेली तक सीमित रखा. कुछ मौकों पर उन्हें कहते सुना गया कि वे अभी सीख रहे हैं. डॉक्टर मनमोहन सिंह ने उन्हें सरकार में शामिल होने का जब भी न्योता दिया,उसे उन्होंने ठुकरा दिया. लेकिन 27 सितंबर 2013 को ऐसा अवसर आया जब इस असलियत का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ कि भले राहुल सरकार में न हों लेकिन उनकी अनदेखी मुमकिन नहीं है. तब अजय माकन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी अचानक पहुंचे थे और उस अध्यादेश को बकवास बताते हुए फाड़ दिया था, जिसमें अदालत से दोषी ठहराये गए सांसदविधायक की तत्काल अयोग्यता पर रोक लगाई गई थी. भारी फजीहत के बाद मनमोहन सरकार ने यह अध्यादेश वापस ले लिया था.
संसदीय राजनीति में राहुल गांधी की एंट्री 2004 में हुई थी. फोटो: PTI
प्रवेश के साथ ही पार्टी का चेहरा
सांसद के तौर पर राहुल गांधी ने शुरुआती दस साल लड़ने की तैयारी में बिताए. किसी सामान्य सांसद के राजनीतिक सफ़र के लिए यह बड़ा वक्त नहीं माना जाएगा. लेकिन राहुल तो सक्रिय राजनीति में प्रवेश के साथ ही कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे मान लिए गए थे. ये दस साल थे पार्टी की सरकार के.
राहुल इस बीच सरकार और संगठन के जरिए पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए मेहनत कर सकते थे. लेकिन चुनाव अभियान की जिम्मेदारी उन्होंने 2014 में तब संभाली जब यू.पी.ए. सरकार की दस सालों की नाकामियों के साथ ही विभिन्न राज्यों में भाजपा के बढ़ते जनाधार और क्षेत्रीय दलों के उभार के बीच कांग्रेस निरंतर सिकुड़ रही थी. तभी से वे पार्टी का चेहरा बने हुए हैं. उनकी अगुवाई में लड़े गए 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को क्रमशः 44,52 और 99 सीटें हासिल हुईं.
अगुवाई में लगातार तीन हार
अब तक लोकसभा के तीन चुनावों में पार्टी के चुनावी अभियान का राहुल असफल नेतृत्व कर चुके हैं. राज्यों के चुनावों में भी वे कोई करिश्मा नहीं दिखा सके हैं. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। कांग्रेस के उद्धार के लिए भाजपा का सत्ता से बाहर जाना जरूरी है. मुश्किल यह है कि कांग्रेस की अकेले मौजूदा ताकत से यह मुमकिन नहीं है. 2024 के चुनाव में विपक्षी गठबंधन ने भाजपा को 240 पर रोक दिया था. 2019 की 52 सीटों की तुलना में 99 पर पहुंचने से कांग्रेस का हौसला बढ़ा था. लेकिन इसके बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में जोरदार जीत दर्ज करके भाजपा लोकसभा चुनाव नतीजों के झटके से उबर गई.
भारत जोड़ो न्याय यात्रा के एक पड़ाव के बीच राहुल गांधी. फोटो: PTI
दूसरी ओर कांग्रेस के साथ ही उसके गठबंधन सहयोगियों की ताकत और घटी. राहुल की मुश्किल है कि गठबंधन सहयोगी जब ताकत में रहते हैं तो उन्हें राहुल और कांग्रेस के नेतृत्व से ऐतराज रहता है. दूसरी ओर कांग्रेस अकेले भाजपा का मुकाबला करने की हालत में नहीं है.
चौकन्ने सहयोगी सिर्फ केंद्र में साथ
2024 के चुनाव बाद का परिदृश्य कांग्रेस के लिए उत्साहित करने वाला नहीं रहा. इस चुनाव में कांग्रेस के उभार ने भाजपा से ज्यादा उसके इंडी गठबंधन के सहयोगियों को सजग किया. कांग्रेस का मजबूत होना सिर्फ भाजपा नहीं कांग्रेस की सहयोगी क्षेत्रीय पार्टियों के लिए भी फिक्र का मुद्दा रहता है. कुछ मामलों में यह भाजपा से अधिक सहयोगियों की चिंता बढ़ाने वाला होता है.असलियत में क्षेत्रीय दलों ने कई राज्यों में कांग्रेस की कीमत पर खुद को मजबूत किया है. उनकी इस मजबूती में मुस्लिम वोटों का बड़ा योगदान है. ये वोट बैंक उस पार्टी से जुड़ता है , जो भाजपा को रोक सके.
कांग्रेस के मजबूत होने का मतलब मुस्लिम वोटों की उसकी ओर वापसी होगी. उनका मुड़ना भाजपा विरोधी अन्य वोटरों को भी कांग्रेस की ओर आकर्षित कर सकता है. अपने राज्यों में इस वोट बैंक पर काबिज क्षेत्रीय पार्टियां ये खतरा क्यों मोल लेना चाहेंगी ? लोकसभा चुनाव में वे कांग्रेस के इसलिए सहयोगी बनते हैं , क्योंकि केंद्र की सत्ता में उनकी सीमित साझेदारी ही मुमकिन होती है. इसे हासिल करने के लिए कांग्रेस का सहयोग और सीटों पर समझौता उन्हें घाटे का सौदा नहीं लगता. लेकिन राज्यों में हिस्सेदारी का सवाल पेचीदा है , जिसके चलते एकता कायम नहीं रह पाती.
राहुल गांधी की कई बार कोशिशें मजाक बन गईं. फोटो: राज्यसभा
राहुल की शैली बन जाती है मजाक
केंद्र में मजबूत होने के लिए राज्यों में मजबूत होना कांग्रेस की जरूरत है. कांग्रेस को अपनी पुरानी ताकत की तलाश है. पार्टी सिर्फ लोकसभा चुनाव के भरोसे नहीं बैठी रह सकती. लेकिन राज्यों की उसकी मुहिम शुरू होते ही गठबंधन के साथी अपनी राह अलग पकड़ना शुरू कर देते हैं. इसका नजारा राज्यों के चुनावोंउपचुनाव सभी जगह देखने में आता है. यह एकतरफा भी नहीं है.
कांग्रेस जहां सीधे भाजपा से मुकाबले में है, वहां वह अकेली लड़ना चाहती है. तो दूसरी तरफ क्षेत्रीय ताकतें अपने प्रभाव वाले राज्यों में कांग्रेस को प्रतीकात्मक हिस्सेदारी तक सीमित रखना चाहती हैं. कांग्रेस में आखिरी फैसले राहुल के होते हैं. किसी सवाल पर असहमति होने के बाद भी पार्टी उन्हीं का अनुकरण करती है.
पर उनका संकट यह है कि जिस लाइन को एक बार पकड़ते हैं, उसे इतना दोहराते हैं कि लोग गंभीरता से लेना बंद कर देते हैं. उनका चौकीदार चोर का नारा आखिर में मजाक बन गया. अडानीअंबानी, राफेल का यही हाल रहा. जातिवार जनगणना के पक्ष में जितने सुर तेज किए, पलट सवाल उतने ही होते रहे कि अपनी सरकार रहने पर इसके लिए आपको किसने रोका था? फिलहाल वोट चोरीचुनाव चोरी का जुमला उनकी जुबान पर चढ़ा हुआ है. राहुल की यह शैली समर्थकों को भले भाती हो लेकिन सहयोगी दल भी एक सीमा से आगे इन मसलों में कांग्रेस के साथ नहीं चलते.
चुनाव नतीजे बारबार राहुल को असफल साबित कर रहे हैं. फोटो: PTI
करिश्मे का इंतज़ार
पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में लड़े गए शुरुआती तीनों चुनावों में कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया. इंदिरा गांधी की अगुवाई में चार में तीन मौकों पर कांग्रेस की धूम रही. परिवार की तीसरी पीढ़ी के राजीव गांधी ने 1984 में पिछले सभी नतीजों से आगे बढ़ 414 सीटों पर जीत का रिकॉर्ड बनाया था. लेकिन इसी के बाद पार्टी का पराभव और नेहरूगांधी परिवार का आभामंडल क्षीण होना शुरू हो गया.
1991, 2004 और 2009 में पार्टी की सरकारें दूसरों के समर्थन पर टिकी रहीं. 1998 के चुनावों से सोनिया गांधी ने तेजी से जनाधार खोती पार्टी को संभालने की कोशिश की. उनका विदेशी मूल का होना कदमकदम पर आड़े आ रहा था. फिर भी उनके नेतृत्व में मिली सीटों ने 2004 और 2009 में केंद्र की यू.पी.ए. सरकारों की अगुवाई का कांग्रेस को मौका दे दिया. राहुल के आगे आने के बाद पार्टी के सामने अब नेतृत्व के संकट का सवाल नहीं है. संकट और चुनौती राहुल के सक्षम साबित होने की है. पार्टी के खोए जनाधार की वापसी की शर्त है कि नेतृत्व ऐसा करिश्माई हो कि उसकी मौजूदगी और मेहनत संगठन में जान फूंक दे. उसका नामकाम वोटरों के सिर जादू चढ़ कर बोले. सत्ता पक्ष को वोटरों के बीच निरुत्तर कर दे. इन मुद्दों के फैसले चुनाव में होते हैं. चुनाव नतीजे बारबार राहुल को असफल साबित कर रहे हैं.
अपने कुनबे को संजोने की चुनौती
राहुल मेहनत नहीं कर रहे हैं, ऐसा नहीं है. लोकसभा या अनेक राज्यों के विधानसभा चुनावों की पराजय के बाद भी वे लगातार नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रति आक्रामक हैं. लेकिन वे कभी संगठन के कायाकल्प करने की कोशिशें करते दिखते हैं तो कभी ठिठक जाते हैं. एक ओर नेताओंकार्यकर्ताओं में जोश भरते हैं. दूसरी ओर उनसे मुश्किल से मुलाकात की शिकायतें आम है. 2019 के चुनाव के बाद राहुल ने पार्टी का अध्यक्ष पद त्याग दिया. उन्हें मनाने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं. इस बात पर भी अड़े रहे कि अध्यक्ष गांधी परिवार के बाहर का रहेगा.
राहुल के आगे आने के बाद पार्टी के सामने अब नेतृत्व के संकट का सवाल नहीं है. फोटो: PTI
अगले तीन साल बतौर कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी पद पर रहीं. फिर मल्लिकार्जुन खड़गे अध्यक्ष बनाए गए. राहुल ने वादा निभाया. अध्यक्ष परिवार के बाहर से चुन लिया गया. लेकिन पार्टी से जुड़े हर अहम सवाल पर अंतिम निर्णय राहुल का रहने पर किसी को संदेह नहीं है. पार्टी के कई जाने पहचाने चेहरों ने इस बीच पार्टी छोड़ी है. जुड़ने से ज्यादा लोग टूटे हैं. जाने वालों को सत्ता का लोभी मान लिया गया. अनेक इसी लिए दूसरे पाले में गए भी होंगे. लेकिन मुखिया से खराब दौर में कुनबे को संजोए रखने के कौशल की उम्मीद की जाती है. सवाल सिर्फ राहुल की क्षमता का ही नहीं है. सवाल यह भी है कि जिन्हें शिकायतें थीं अथवा हैं ,उन्हें संतुष्ट करने या समाधान की राहुल की ओर से कैसी कोशिशें हुईं ?
लंबी पदयात्राएं, फिर भी सत्ता दूर
गांधी परिवार के वे पहले सदस्य हैं, जिसने पार्टी की खोई जमीन की वापसी के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले साल भर से कम वक्त के भीतर राहुल गांधी ने दो बड़ी यात्राएं कीं. पहली बार 136 दिन की 3570 किलो मीटर की पदयात्रा थी. यह 12 राज्यों और 2 केंद्र शासित राज्यों से होकर गुजरी. दूसरी बार 15 राज्यों में 67 दिन के भीतर 6713 किलो मीटर की दूरी तय करने के लिए उन्होंने बस की सहायता ली. बीच बीच में वे पैदल भी चले. पहली बार राहुल ने दक्षिण में कन्याकुमारी से उत्तर में श्रीनगर तक की यात्रा की.
दूसरी बार यात्रा पूर्व में मणिपुर से शुरू हुई और पश्चिम में मुंबई में उसका समापन हुआ. पहली बार वे ” भारत जोड़ो यात्रा ” का नाम लेकर जनता के बीच पहुंचे. दूसरी बार इसका नाम ” भारत जोड़ो न्याय यात्रा ” था. राजनेताओं की यात्रा का नाम कुछ हो, उसके हासिल का हिसाब चुनाव नतीजों के जरिए ही आंका जाता है. इन यात्राओं ने संदेश दिया कि राहुल अब पूरी संजीदगी से मुकाबले के लिए तैयार हैं. पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं का भी हौसला बढ़ा. 2024 के लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ीं लेकिन यह 99 पर अटक गईं.
पार्टी के लिए अपरिहार्य
कांग्रेस को संजीवनी की तलाश है. अनिवार्य शर्त है कि यह संजीवनी गांधी परिवार के बीच से ही मिले. सोनिया अपना सर्वश्रेष्ठ दे चुकीं. प्रियंका 1999 से अमेठी ,रायबरेली में सक्रिय हुईं. 20 साल बाद 2019 में औपचारिक रूप से वे राजनीति में सक्रिय हुईं. पार्टी की महामंत्री के तौर पर उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी संभाली. पार्टी का ट्रंप कार्ड मानी जाती थीं. लेकिन कोई करिश्मा नहीं दिखा सकीं. अब संसद में भी भाई के साथ हैं. सोनिया राज्यसभा में हैं. पर असली कमान राहुल के ही हाथ में है. लगातार तीन चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच की लड़ाई नरेंद्र मोदी बनाम राहुल में सिमट गई. भाजपा के लिए यह मुफीद है. भाजपा खींचती है और राहुल उसकी पिच पर पहुंच मोदी के मुक़ाबिल हो जाते हैं. इसके दृश्य लोकसभा की कार्यवाही से सभाओंरैलियों तक में दिखते हैं. विदेशी दौरों तक में वे मोदी और उनकी सरकार पर प्रहार का कोई मौका नहीं छोड़ते. राहुल लड़ने में भरोसा रखते हैं. वे लड़ रहे हैं. वोटर कुछ भी फैसला करें. पार्टी के लिए उनका नेतृत्व निर्विवाद और अपरिहार्य है.