टैक्स रिफंड की प्रक्रिया को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने इनकम टैक्स विभाग को कड़ी फटकार लगाई है. अदालत का साफ कहना है कि विभाग के कामकाज का तरीका बेहद निराशाजनक तस्वीर पेश कर रहा है. इस सख्त टिप्पणी के साथ ही कोर्ट ने रेवेन्यू विभाग को कड़ा निर्देश दिया है कि वो वोडाफोन आइडिया को 53.09 करोड़ रुपये का रिफंड लागू ब्याज समेत जल्द वापस करे. जस्टिस दिनेश मेहता, जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की डिविजन बेंच ने 18 अगस्त के अपने आदेश में कहा है कि 30 सितंबर 2026 तक हर हाल में ये रकम कंपनी को मिल जानी चाहिए. अगर इस तय तारीख तक पैसा खाते में नहीं पहुंचता है, तो वैधानिक ब्याज के ऊपर विभाग को हर महीने 1 फीसदी का अतिरिक्त ब्याज देना पड़ेगा.

क्या है मामला?
ये पूरा मामला असेसमेंट ईयर 200304 से लेकर 201314 के बीच के टैक्स रिफंड से जुड़ा है. वोडाफोन आइडिया ने इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल में करीब एक दशक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी. अप्रैल 2024 से फरवरी 2025 के बीच ट्रिब्यूनल ने कंपनी के पक्ष में कई फैसले सुनाए. इन फैसलों के आधार पर असेसिंग ऑफिसर ने रिफंड की रकम 53.09 करोड़ रुपये तय की. लेकिन अक्टूबर 2024, मई 2026 में रिफंड तय होने के बावजूद कंपनी को पैसा नहीं मिला. विभाग ने रिफंड देने से पहले फॉर्म 26B भरने की जिद पकड़ ली. फॉर्म 26B दरअसल ज्यादा काटे गए टीडीएस के रिफंड का दावा करने के लिए इस्तेमाल होता है.
बिना कानूनी आदेश नहीं रुकेगा रिफंड
जब कंपनी ने दो असेसमेंट ईयर के लिए फॉर्म जमा किए, तो विभाग ने पुरानी बकाया डिमांड का हवाला देकर अर्जी खारिज कर दी. विभाग का कहना था कि 924.57 करोड़ रुपये का बकाया है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। हालांकि, कोर्ट में विभाग ने खुद माना कि इसमें से 913.66 करोड़ रुपये की वसूली पर पहले ही अलगअलग अथॉरिटी, अदालतों ने रोक लगाई हुई है. बाकी बचे बकाया पर भी कंपनी ने विवाद दर्ज कराया था. हाईकोर्ट ने इस रवैये पर कड़ा रुख अपनाया. कोर्ट ने कहा कि जब अपीलेट अथॉरिटी से रिफंड का आदेश आ चुका है, तो ये टैक्सपेयर का पक्का अधिकार बन जाता है.
जुर्माना लगाने लायक था विभाग का रवैया
अदालत ने स्पष्ट किया कि असेसिंग ऑफिसर या सीपीसी अपीलेट आदेश के तहत बने रिफंड को जारी करने से पहले फॉर्म 26B की मांग नहीं कर सकते. बिना सेक्शन 245 के तहत कानूनी आदेश पारित किए कोई भी रिफंड रोका या एडजस्ट नहीं किया जा सकता. सिर्फ किसी बकाया डिमांड या सिस्टर कंपनी के पैनटैन का बहाना बनाकर पैसा रोकना पूरी तरह गलत है. बेंच ने ये भी टिप्पणी की कि ये मामला ऐसा था जिसमें विभाग पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए था, लेकिन कोर्ट ने फिलहाल ऐसा नहीं किया.
टैक्सपेयर्स को मिली बड़ी राहत
टैक्स कंसल्टिंग फर्म एकेएम ग्लोबल के पार्टनर मनीष गर्ग ने इस फैसले को बेहद अहम बताया. उनका कहना है कि ये फैसला उन मामलों में बहुत काम आएगा जहां पुराने टीडीएस विवाद चल रहे हैं. अब टैक्सपेयर्स को अपना ही तय पैसा वापस पाने के लिए बेवजह दोबारा कानूनी लड़ाई का सामना नहीं करना पड़ेगा. गर्ग ने स्पष्ट किया कि इसका मतलब ये नहीं है कि बकाया होने पर रिफंड कभी नहीं रोका जा सकता. लेकिन इसके लिए सेक्शन 245 के तहत कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है. सिर्फ किसी प्रशासनिक नियम के नाम पर तय रिफंड को रोकना जायज नहीं है.



