समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लखनऊ के जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र को एक निजी ग्रुप को पट्टे पर देने के फैसले पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने आरोप लगाया है कि बीजेपी सरकार लगातार सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण की ओर बढ़ रही है. अब उनके इस बयान पर बीजेपी ने भी पलटवार किया है. बीजेपी ने आरोप लगाया कि सपा सरकार में लूट और भ्रष्टाचार खूब होती थी. जेपीएनआईसी का काम मुलायम यादव की सरकार में शुरू हुआ था और अखिलेश सरकार में और पैसा दिया गया, लेकिन योगी सरकार की ऐसी व्यवस्था है कि सैफई परिवार लूट नहीं कर पाएगा.

केंद्रीय राज्य मंत्री बीएल वर्मा और बीजेपी प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह ने सपा अध्यक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि अखिलेश यादव से बेहतर कौन जान सकता है भ्रष्टाचार के बारे में. सपा सरकार में गरीबों का राशन चोरी कर लिया जाता था, अखिलेश यादव बीजेपी सरकार का विकास नहीं देखना चाहते हैं. बीजेपी प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा कि 800 करोड़ से ज्यादा लगाकर जेपीएनआईसी बना, लेकिन आजतक फंक्शनल नहीं है. उन्होंने कहा कि जेपीएनआईसी को सरकार ने बेचा नहीं है, बल्कि अधिकार लखनऊ विकास प्राधिकरण के ही पास है.

बीजेपी सरकार है या दुकानदार?

अखिलेश यादव ने बीते बुधवार को बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा था कि ‘क्या बीजेपी सरकार है या दुकानदार? अब उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार ने कैबिनेट में लखनऊ के जेपीएनआईसी को निजी हाथों में सौंपने का फैसला लिया है. अब बस यही बचा है कि या तो इसे ठेके पर दिया जाए या सरकार को बेच दिया जाए. कमीशन भ्रष्ट बीजेपी के लिए ईंधन का काम करते हैं और निजीकरण ही इसका एकमात्र समाधान है’.

राज्य मंत्रिमंडल ने LDA के प्रस्ताव को दी मंजूरी

उससे पहले मंगलवार को राज्य मंत्रिमंडल ने लखनऊ विकास प्राधिकरण के उस प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जिसके तहत जेपीएनआईसी को 30 सालों की अवधि के लिए संचालन और रखरखाव हेतु एक निजी ग्रुप को पट्टे पर दिया जाएगा. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। प्रस्ताव के अनुसार, चयनित निजी ग्रुप एलडीए को 831 करोड़ रुपये का भुगतान करेगा.

जेपीएनआईसी को पट्टे पर देने का क्या मकसद?

दरअसल, जेपीएनआईसी पिछली समाजवादी पार्टी की सरकार की प्रमुख परियोजनाओं में से एक थी और लंबे समय से राजनीतिक विवाद का केंद्र रही है. राज्य सरकार का दावा है कि परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत लगभग 265 करोड़ रुपये थी, जो बाद में बढ़कर 800 करोड़ रुपये से अधिक हो गई. सरकार का कहना है कि जेपीएनआईसी को पट्टे पर देने का उद्देश्य लंबे समय से अधूरे और विवादास्पद परिसर को सम्मेलनों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेल गतिविधियों के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करना है.

वहीं, एलडीए के अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि कैबिनेट की मंजूरी जेपीएनआईसी की संपत्ति की बिक्री के लिए नहीं है बल्कि केंद्र को संचालन और रखरखाव के लिए 30 सालों के लिए पट्टे पर दिया जाएगा. प्राधिकरण भूमि और पूरी संपत्ति का स्वामित्व अपने पास रखेगा, जबकि सेलेक्टेड बिडर टेंडर की शर्तों के अनुसार केंद्र के संचालन और रखरखाव के लिए जिम्मेदार होगा. हालांकि अखिलेश यादव ने सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे निजीकरण नीति का हिस्सा बताया और बीजेपी सरकार पर सार्वजनिक संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने का आरोप लगाया.