अफ्रीकी देश टोगो ने बीते 4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में करेक्ट द मैप प्रस्ताव पेश किया था. उसी दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मतदान के बाद इसे मंजूरी दे दी. इसके पक्ष में 164 वोट पड़े. अमेरिका ने विरोध किया. छह देश मतदान से दूर रहे. भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया. प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसे मानचित्रों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जिनमें महाद्वीपों और देशों का वास्तविक क्षेत्रफल अधिक सही अनुपात में दिखाई दे. टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसी ने इस पहल का समर्थन करते हुए कहा कि नक्शे केवल भौगोलिक जानकारी नहीं देते, बल्कि वे दुनिया के बारे में हमारी सोच और शिक्षा को भी प्रभावित करते हैं.

आइए, इसी बहाने जानते हैं कि कैसे तैयार होता है किसी देश का नक्शा? सैटेलाइट से पहले कैसे बनते थे मैप? संयुक्त राष्ट्र ने कैसे बदला दुनिया का मैप? अमेरिका ने क्यों किया इस प्रस्ताव का विरोध?

नक्शे के कैसेकैसे इस्तेमाल?

हम दुनिया को नक्शे के जरिए समझते हैं. स्कूल की किताबों में नक्शा देखते हैं. यात्रा के दौरान नक्शे का इस्तेमाल करते हैं. सेना, सरकार और वैज्ञानिक भी नक्शों पर निर्भर रहते हैं. लेकिन क्या नक्शा धरती की बिल्कुल सही तस्वीर दिखाता है? इसका जवाब हैनहीं. धरती गोल है. नक्शा सपाट होता है. गोल धरती को सपाट कागज या स्क्रीन पर दिखाना आसान नहीं है. इस प्रक्रिया में कुछ हिस्से बड़े दिखते हैं. कुछ हिस्से छोटे दिखते हैं. इसी कारण दुनिया के नक्शे को लेकर समयसमय पर विवाद होते रहे हैं. हाल में संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव के बाद यह बहस फिर चर्चा में आ गई. इस प्रस्ताव में ऐसे नक्शों को बढ़ावा देने की बात कही गई है, जो देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल अधिक सही तरीके से दिखाते हैं.

नक्शा बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

प्राचीन समय में लोग रास्ते याद रखकर यात्रा करते थे. नदियों, पहाड़ों और समुद्रों को पहचानकर दिशा तय की जाती थी. धीरेधीरे व्यापार बढ़ा. समुद्री यात्राएं शुरू हुईं. नए द्वीपों और देशों की खोज हुई. तब यात्रियों को रास्ते की जानकारी लिखित रूप में रखने की जरूरत महसूस हुई. यहीं से नक्शों का विकास शुरू हुआ. प्राचीन सभ्यताओं में मिट्टी की पट्टियों पर नक्शे बनाए जाते थे. कुछ नक्शे पत्थरों पर बनाए गए. कई नक्शे हाथ से तैयार होते थे. उनमें नदियों, पहाड़ों और बस्तियों को चिन्हित किया जाता था. इन नक्शों में दूरी और दिशा हमेशा सही नहीं होती थी. फिर भी वे उस समय के लिए बहुत उपयोगी थे.

सैटेलाइट से पहले नक्शे कैसे बनते थे?

सैटेलाइट आने से पहले नक्शे जमीन पर जाकर बनाए जाते थे. इसे सर्वेक्षण कहा जाता है. सर्वे करने वाले लोग जमीन की दूरी मापते थे. ऊंचाई का पता लगाते थे. नदियों और पहाड़ियों की स्थिति दर्ज करते थे. इसके लिए कई उपकरण इस्तेमाल होते थे. कंपास से दिशा पता की जाती थी. चेन और रस्सी से दूरी मापी जाती थी. बाद में थियोडोलाइट जैसे उपकरण आए. इनकी मदद से कोण और ऊंचाई मापी जाती थी.

सर्वेक्षक किसी स्थान को एक निश्चित बिंदु मानते थे. इसके बाद दूसरे स्थानों की दूरी और दिशा उस बिंदु से मापी जाती थी. कई बिंदुओं को जोड़कर नक्शा तैयार किया जाता था. पहाड़ों वाले इलाकों में यह काम बहुत कठिन होता था. सर्वेक्षक पैदल चलते थे. कई बार उन्हें जंगलों, रेगिस्तानों और बर्फीले क्षेत्रों से गुजरना पड़ता था. भारत में भी पुराने समय में बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण हुआ. ब्रिटिश शासन के दौरान ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे शुरू किया गया था. इस सर्वे का उद्देश्य भारत की भौगोलिक स्थिति और ऊंचाई का पता लगाना था. उस समय वैज्ञानिकों ने पहाड़ों, नदियों और मैदानों को मापने में वर्षों लगाए.

धरती को कागज पर दिखाने के लिए विशेष गणितीय तरीका अपनाया जाता है, इसे मैप प्रोजेक्शन कहते हैं.

नक्शा बनाने में गणित की भूमिका

नक्शा केवल चित्र नहीं होता. इसके पीछे गणित और विज्ञान काम करते हैं. धरती पर किसी स्थान की स्थिति अक्षांश और देशांतर से बताई जाती है. अक्षांश रेखाएं धरती के चारों ओर पूर्व से पश्चिम दिशा में होती हैं. देशांतर रेखाएं उत्तर से दक्षिण दिशा में जाती हैं. इन रेखाओं की मदद से किसी स्थान की स्थिति तय की जाती है. इसके बाद उस जानकारी को कागज पर उतारा जाता है. लेकिन धरती गोल है. कागज सपाट है. इसलिए धरती को कागज पर दिखाने के लिए विशेष गणितीय तरीका अपनाया जाता है. इसे मैप प्रोजेक्शन कहा जाता है.

मर्केटर प्रोजेक्शन क्या है?

मर्केटर प्रोजेक्शन दुनिया के सबसे प्रसिद्ध नक्शों में से एक है. इसे 1569 में जेरार्डस मर्केटर ने तैयार किया था. इस नक्शे का मुख्य उद्देश्य समुद्री यात्राओं में मदद करना था. इसमें दिशा और कोण को समझना आसान होता है. इसी वजह से यह नाविकों के लिए उपयोगी साबित हुआ. लेकिन इसकी एक बड़ी कमी है. मर्केटर नक्शे में ध्रुवों के पास के इलाके वास्तविक आकार से बड़े दिखाई देते हैं. भूमध्य रेखा के पास के इलाके तुलनात्मक रूप से छोटे नजर आते हैं. उदाहरण के लिए, ग्रीनलैंड नक्शे पर बहुत बड़ा दिखाई देता है. कई बार वह अफ्रीका के लगभग बराबर नजर आता है. लेकिन असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से कई गुना बड़ा है. इसी तरह उत्तरी यूरोप, कनाडा और रूस का आकार भी नक्शे पर वास्तविकता से अधिक बड़ा दिखाई दे सकता है.

इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन क्या है?

इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन एक आधुनिक नक्शा प्रणाली है. इसे 2018 में विकसित किया गया था. इसका मुख्य उद्देश्य देशों और महाद्वीपों का क्षेत्रफल अधिक सही अनुपात में दिखाना है. इसमें अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और एशिया का आकार वास्तविकता के अधिक करीब दिखाई देता है. इस नक्शे में ग्रीनलैंड छोटा नजर आता है. अफ्रीका का विशाल आकार अधिक स्पष्ट होता है. हालांकि, इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन भी हर चीज को बिल्कुल सही नहीं दिखा सकता. गोल धरती को सपाट सतह पर दिखाने में किसी न किसी चीज में बदलाव आता है. कोई नक्शा क्षेत्रफल को सही रखता है. कोई दिशा को सही रखता है. कोई दूरी को बेहतर दिखाता है. कोई आकृति को प्राथमिकता देता है. इसलिए दुनिया में एक ही नक्शा हर काम के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव क्या है?

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने करेक्ट द मैप नाम के प्रस्ताव का समर्थन किया है. उपलब्ध रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने मतदान किया. अमेरिका ने इसका विरोध किया. छह देश मतदान से दूर रहे. यह समझना जरूरी है कि संयुक्त राष्ट्र ने किसी देश की सीमा नहीं बदली है. किसी देश की जमीन भी नहीं बदली है. यह प्रस्ताव मुख्य रूप से नक्शे पर क्षेत्रफल को अधिक वास्तविक दिखाने से जुड़ा है. यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी भी नहीं है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। इसका मतलब है कि दुनिया के सभी देशों को तुरंत अपने पुराने नक्शे बदलना जरूरी नहीं है. प्रस्ताव का उद्देश्य स्कूलों, संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों को अधिक संतुलित नक्शों पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित करना है.

UN के प्रस्ताव पर पक्ष में 164 देशों ने मतदान किया.

अमेरिका ने विरोध क्यों किया?

अमेरिका इस प्रस्ताव का विरोध करने वाला एकमात्र देश रहा. अमेरिकी पक्ष का तर्क था कि नक्शे का चुनाव एक तकनीकी विषय है. संयुक्त राष्ट्र को दुनिया की बड़ी समस्याओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए. अमेरिका ने यह भी संकेत दिया कि किसी एक नक्शे को विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है. उसके अनुसार, अलगअलग कामों के लिए अलगअलग प्रोजेक्शन उपयोगी हो सकते हैं. दूसरी ओर, प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि नक्शे लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं. यदि कोई महाद्वीप लगातार छोटा दिखाई दे, तो उसके वास्तविक आकार और महत्व को लेकर गलत धारणा बन सकती है.

भारत पर क्या असर होगा?

इस बदलाव से भारत की जमीन या सीमा पर कोई असर नहीं पड़ेगा. भारत का वास्तविक क्षेत्रफल वही रहेगा. नए प्रोजेक्शन में भारत का आकार कुछ अलग दिख सकता है. यह बदलाव दूसरे देशों के साथ तुलना में अधिक साफ नजर आएगा. भारत भूमध्य रेखा से बहुत दूर नहीं है. इसलिए उस पर मर्केटर प्रोजेक्शन का असर ग्रीनलैंड या कनाडा की तुलना में कम है. फिर भी इक्वल अर्थ नक्शे में भारत का क्षेत्रफल अधिक संतुलित दिखाई दे सकता है. भारत और पाकिस्तान की जगह नहीं बदलेगी. दोनों देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं भी नहीं बदलेंगी. बदलाव केवल नक्शे पर प्रस्तुतिकरण का होगा.

क्या मर्केटर नक्शा खत्म हो जाएगा?

मर्केटर नक्शा समुद्री और हवाई नेविगेशन में अब भी उपयोगी है. इसमें दिशा और कोणों को समझना आसान होता है. दूसरी ओर, इक्वल अर्थ जैसे नक्शे शिक्षा, जनसंख्या अध्ययन और क्षेत्रफल की तुलना के लिए उपयोगी हो सकते हैं. भविष्य में अलगअलग जरूरतों के लिए अलगअलग नक्शे इस्तेमाल होते रहेंगे.