
Just in: India faces a multi-pronged blow—Saudi supplies halted, disruptions in Russian shipments, and Trump imposes a 100% tariff.
नई दिल्ली: कच्चे तेल की कीमत मंगलवार को 108 डॉलर के पार पहुंच गई थी। उसके बाद इसमें कुछ गिरावट आई है लेकिन यह अब भी 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। भारत के लिए यह खासतौर पर चिंता की बात है। इसकी वजह यह है कि भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा बड़ा आयातक है और अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी तेल आयात करता है। तेल की कीमत में 1 डॉलर प्रति बैरल की तेजी से भारत का सालाना आयात बिल 18,000 करोड़ रुपये बढ़ जाता है। इंडियन बास्केट की कीमत हाल में 130 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी। अगस्त में भारत का आयात 3% गिर गया लेकिन बिल पिछले साल के मुकाबले 18% बढ़ गया।
भले ही भारत अब तक अमेरिका-ईरान टकराव से कच्चे तेल की सप्लाई में किसी बड़े झटके से बचा हुआ है, लेकिन देश के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। इसकी वजह यह है कि भारत के टॉप सप्लायर्स में से एक सऊदी अरब ने भारत के लिए अपनी टंकी बंद कर दी है। हूती विद्रोहियों के ड्रोन हमलों के बाद सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद कर दी गई है। देश के सबसे बड़े सप्लायर रूस से भी शिपमेंट में दिक्कत आ रही हैं। इतना ही नहीं चीन ने एक बार फिर कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है जिससे रूसी तेल के लिए भारत और चीन के बीच होड़ बढ़ गई है।
टैंकर का किराया रेकॉर्ड पर
हालांकि भारतीय रिफाइनरीज के लिए दूसरे स्रोतों से तेल ढूंढना मुश्किल नहीं होगा, लेकिन बढ़ती कीमतें और ढुलाई का ज्यादा खर्च उनके लिए बड़ी चुनौती बन रहे हैं। भारत को रूसी कच्चे तेल पर मिल रहा डिस्काउंट भी खत्म हो गया है। सप्लाई में रुकावट के दौरान स्पॉट मार्केट की कीमतें फ्यूचर्स की कीमतों की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ सकती हैं। टैंकर का किराया पहले से ही रिकॉर्ड ऊंचाई के करीब है।
रिफाइनरी इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों को चिंता है कि सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच चल रहा टकराव और बढ़ सकता है। इससे वहां एनर्जी इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए खतरा बढ़ सकता है। सऊदी अरब लंबे समय से दुनिया के बड़े तेल सप्लायर्स में से एक रहा है। ग्लोबल प्रोडक्शन में उसकी हिस्सेदारी करीब 10% है और वह बाजार की स्थितियों के हिसाब से उत्पादन में बदलाव कर सकता है।
कच्चे तेल का आयात
देशमार्च–अगस्तसितंबर–फरवरी रूस 2,478 1,478 सऊदी अरब 440 743 इराक 104 924 यूएई 480 463 अमेरिका 151 345 ब्राजील 274 128 नाइजीरिया 128 200 अंगोला 161 114 वेनेजुएला 233 0 कुवैत 26 169 ओमान 114 24
रूसी तेल की दिक्कत
रूसी कच्चा तेल भारत के आयात बास्केट का सबसे बड़ा हिस्सा बना हुआ है और रिफाइनरियों के लिए सबसे सस्ते विकल्पों में से एक है। लेकिन यूक्रेनी हमलों और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी दिक्कतों के कारण रूस की एक्सपोर्ट करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। इस बीच दुनिया के सबसे बड़े आयातक चीन ने फिर से तेल की खरीद शुरू कर दी है। उसकी रिफाइनरियां फिर से चालू हो रही हैं और ईरानी कच्चे तेल की सप्लाई सीमित बनी हुई है।
कमोडिटी एनालिस्ट नतालिया काटोना ने TOI को बताया कि रूस का एक्सपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर पहले से ही अपनी क्षमता की सीमा के करीब काम कर रहा है। उन्होंने कहा, “एक्सपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल पहले से ही अधिकतम क्षमता के करीब हो रहा है, जबकि ब्लैक सी से होने वाली शिपमेंट पर हमलों, शिपिंग से जुड़े जोखिमों और ज्यादा फ्रेट रेट्स की वजह से रोक लग रही है । अभी ब्लैक सी इलाके से फ्रेट का अनुमान $20 प्रति बैरल है, जबकि बाल्टिक इलाके में लगभग $13 प्रति बैरल है।”
चीन की चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन पहले से ही रूस के कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है। अगर वहां मांग बढ़ती है, तो रूसी तेल के लिए भारतीय रिफाइनरियों को चीन से सीधे मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है। संभव है कि भारत आने वाले रूसी कच्चे तेल की मात्रा में बहुत ज्यादा कमी न आए लेकिन उसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।
रूसी कच्चे तेल की कीमतों में यह बदलाव पहले ही दिख रहा है। जुलाई में $10 प्रति बैरल से ज्यादा के डिस्काउंट के मुकाबले, सितंबर-अक्टूबर में भारत आने वाले ‘यूराल्स’ के लिए ब्रेंट के मुकाबले $1 प्रति बैरल का प्रीमियम मांगा गया था। भारत के लिए तेल की फिजिकल उपलब्धता के बजाय कीमत एक बड़ा जोखिम बन सकती है। कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल $1 की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल रोजाना लगभग $5 मिलियन बढ़ जाता है।
अमेरिका का दबाव
इस बीच अमेरिका से एक नई मुसीबत आई है। अमेरिका की संसद ने हाल में एक बिल पारित किया था जिस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साइन कर दिए हैं। इसमें राष्ट्रपति को उन देशों पर 100 फीसदी तक टैक्स लगाने का अधिकार दिया गया है जो रूस से तेल खरीद रहे हैं। इनमें भारत और चीन शामिल हैं। रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। भारत ने अगस्त में रूस से रोजाना 2.08 मिलियन बैरल कच्चे तेल का आयात किया। अगस्त में भारत के कच्चे तेल के आयात में मॉस्को की हिस्सेदारी 45% थी।
अधिकारियों का कहना है कि अगर रूसी कच्चा तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से कम आकर्षक हो जाता है, उसके पास दूसरे स्रोतों से तेल लेने का विकल्प है। ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। भारत अभी करीब 40 देशों से तेल खरीद रहा है। लेकिन यह आसान नहीं है क्योंकि रूसी तेल को बदलना सिर्फ किसी दूसरे तेल उत्पादक देश को खोजने का सवाल नहीं है। बल्कि रिफाइनरों को कच्चे तेल की गुणवत्ता, ढुलाई खर्च, डिलीवरी की लागत और अपने प्लांट के साथ अनुकूलता पर भी विचार करना होता है।
क्या है विकल्प?
भारत की अलग-अलग जगहों से तेल खरीदने की रणनीति उसे तेल की सप्लाई में भारी कमी से तो बचा सकती है, लेकिन यह अर्थव्यवस्था को कच्चे तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और बीमा खर्च में एक साथ होने वाली बढ़ोतरी के असर से पूरी तरह नहीं बचा सकती। Kpler में मॉडलिंग और रिफाइनिंग के लीड एनालिस्ट सुमित रिटोलिया ने TOI को बताया कि भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा कच्चे तेल की बढ़ती ‘लैंडेड कॉस्ट’ है।
उन्होंने कहा कि भारत के लिए इसका मतलब है तेल आयात का बिल बढ़ना, चालू खाते और रुपये पर ज्यादा दबाव पड़ना। अगर तेल की लागत ज्यादा बनी रहती है तो महंगाई का खतरा भी बढ़ सकता है। कच्चे तेल की ज्यादा ‘लैंडेड कॉस्ट’ का असर तेल मार्केटिंग कंपनियों के मार्जिन और सरकार की वित्तीय स्थिति पर भी पड़ सकता है। इससे सरकार को पेट्रोल और डीजल की कीमत में बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।



