
60 lakh voters review: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज का दिन किसी बड़े भूकंप से कम नहीं है. चुनाव आयोग द्वारा शनिवार को अंतिम मतदाता सूची जारी किए जाने के ठीक पहले एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने लाखों लोगों की धड़कनें बढ़ा दी हैं. राज्य के करीब 60 लाख मतदाताओं के नाम कटने की तलवार लटक रही है. जो कुल मतदाता आबादी का लगभग 8.5 प्रतिशत है.
हैरानी की बात ये है कि जिन नामों को चुनाव अधिकारियों ने पूरी जांच-परख के बाद हरी झंडी दे दी थी, उन्हें चुनाव आयोग के माइक्रो-ऑब्जर्वर्स ने संदिग्ध बताते हुए काट दिया है. अब इन लाखों नामों की पात्रता की जांच खुद सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकारी कर रहे हैं. इस लिस्ट में आम आदमी तो दूर, एक सीनियर आईएएस अधिकारी तक का नाम फंसा हुआ है. अब सवाल ये उठता है कि आखिरी वक्त में 60 लाख नामों को कैसे काट दिया गया. क्या ये किसी बड़ी गड़बड़ी का इशारा है या चुनावी साजिश. आइए, बंगाल की इस चुनावी हलचल के पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी को डिटेल से समझते हैं.
606675 मतदाताओं की दोबारा होगी जांच
जानकारी के मुताबिक SIR प्रक्रिया के बाद जिन मतदाताओं के नाम पहले मंजूर हो चुके थे. अब उन्हीं नामों की फिर से जांच कराई जा रही है. बताया गया है कि कुल 6006675 मतदाता इस दोबारा जांच के दायरे में आ गए हैं. इस वजह से बड़ी संख्या में लोगों को डर है कि कहीं उनके नाम मतदाता सूची से हट न जाएं.
रिपोर्ट के मुताबिक कई जिला स्तर के मतदाता पंजीकरण अधिकारियों और सहायक अधिकारियों ने बताया कि जिन नामों को उन्होंने सभी दस्तावेज देखकर सही मानते हुए मंजूरी दे दी थी. बाद में उन्हीं मामलों को माइक्रो-ऑब्जर्वर्स ने विरोध लगाकर वापस जांच के लिए भेज दिया. अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में दस्तावेज पहले ही अपलोड किए जा चुके थे. इसके बावजूद उन्हें फिर से जांच सूची में डाल दिया गया है. इससे पूरा काम और भी उलझ गया है.
गणना के दौरान माइक्रो-ऑब्जर्वर्स भी थे मौजूद
अधिकारियों के मुताबिक ये संख्या अचानक बहुत तेजी से बढ़ी है. पहले ये आंकड़ा कुछ लाख तक सीमित था. लेकिन 14 फरवरी को हुई अंतिम सुनवाई के आसपास ये संख्या बढ़कर 60 से ज्यादा हो गई है. एक बड़े अधिकारी ने बताया कि नवंबर और दिसंबर में पहले चरण के दौरान गणना फॉर्म एकत्र करने और दस्तावेज अपलोड करने का काम बहुत सावधानी से किया गया था. उस समय माइक्रो-ऑब्जर्वर्स भी मौजूद थे. इसके बावजूद 11 फरवरी के बाद से पहले से मंजूर किए गए कई नाम दोबारा जांच के लिए दोबारा वापस भेजे जाने लगे.
अधिकारी ने बताया कि जब मामलों को वापस भेजा गया था. उस समय सुनवाई की आखिरी तारीख बहुत पास थी. इसलिए दस्तावेजों में यदि कोई कमी थी तो उसे ठीक करने का समय ही नहीं मिला. 14 फरवरी को उनके खाते में दस्तावेज अपलोड करने का ऑप्शन भी बंद हो गया था.
आम मतदाताओं पर पड़ सकता है असर
अधिकारियों का कहना है कि इसके बाद वे किसी भी मतदाता की फाइल में सुधार नहीं कर सके. इस पूरी प्रक्रिया का असर सीधे तौर पर पश्चिम बंगाल के आम मतदाताओं पर पड़ सकता है. जिन लोगों के नाम पहले सही माने जा चुके थे. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। अब वे फिर से असमंजस में हैं. अधिकारियों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में मामलों की दोबारा जांच से दबाव भी बढ़ गया है. फिलहाल अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी 2026 को जारी की जाएगी. इसके पहले 2 बार तारीख को आगे बढ़ाया जा चुका था.