चार दशक पहले सुभाष घई ने अनिल कपूर को लेकर एक फिल्म बनाई थी, जिसका नाम है ‘मेरी जंग’. जिसका टाइटल सॉन्ग ‘जिंदगी हर कदम एक नई जंग है’ काफी पॉपुलर हुआ था. ये फिलम और इसका ये गीत मौजूदा बैंक कर्मचारियों की दैनिक दिनचर्या पर काफी सटीक दिखाई दे रहा है. हाल के दिनों में बैंक, उनके कर्मचारी और हड़ताल काफी चर्चा में रहे. बीते कुछ दिनों से खबर थी कि 28 से 30 सितंबर तक बैंक कर्मचारी हड़ताल पर पर रहेंगे.

27 सितंबर देर रात खबर आई कि कर्मचारी संगठन और आईबीए के बीच बैठक में कुछ फैसले लिए गए हैं. जिसकी वजह से हड़ताल को टाल दिया गया है. इसी हड़ताल की वजह से आरबीआई ने नोटिफिकेशन जारी कर रविवार की छुट्टी को कैंसल कर दिया था और सभी कर्मचारियों को बैंक ब्रांच में बुलाया था. उसके बाद देर रात पता चला कि हड़ताल नहीं है.
ये बैंक कर्मचारियों की परेशानी का छोटा और मामूली हिस्सा है. बैंक यूनियंस की मांगों और परेशानियों से इतर एक बैंक कर्मचारी रोज कौन कौन सी परेशानियों का सामना करता है, उसका हिसाब कोई रखने वाला नहीं है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। जब टीवी9 भारतवर्ष के डिजिटल विंग की टीम ने एक्सक्लूसिवल यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के दिल्ली के एक कर्मचारी से बात की तो उसने नाम ना प्रकाशित करने की शर्त पर खुलकर सभी बातें रखीं.
उसने बताया कि कैसे उनसे 10 से 12 घंटे काम कराया जा रहा है. कैसे उनपर सरकारी स्कीम बेचने का दबाव है? थर्ड पार्टी इंश्योरेंस और म्यूचुअल फंड बेचने का काम भी उन्हीं से कराया जाता है. जिसका उन्हें कमीशन भी नहीं मिलता. यहां तक कि उन्हें लगातार तीन दिनों का अवकाश होने पर भी स्टेशन छोड़ने की परमीशन नहीं है. इसके लिए उन्हें स्पेशल एप्लीकेशन लगानी पड़ती है. जिसका अप्रूवल बामुश्किल मिलता है.
रोजमर्रा की जिंदगी में क्या झेलते हैं बैंक कर्मचारी
- क्लैरिकल की ऑफिशियल ड्यूटी 7 घंटे और ऑफिसर्स की 8 घंटे की है, उसके बाद भी 10 से 11 घंटे काम करना पड़ रहा है.
- वर्कफोर्स की भारी कमी है. हरेक ब्रांच में औसतन 5 क्लर्क में से दो ही है और ऑफिसर्स 6 से 7 होने चाहिए सिर्फ 3 हैं.
- बैंक कर्मियों और अधिकारियों पर सरकारी स्कीम बेचने का दबाव है. पीएम जीवन ज्योति योजना, अटल पेंशन स्कीम और पीएम सुरक्षा बीमा योजना पर फोकस है.
- स्कीम ना बेचने या टारगेट पूरा ना होने पर कर्मचारियों को मानसिक तौर पर परेशान किया जाता है.
- थर्ड पार्टी इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स, म्यूचुअल फंड्स बेचने का भी काफी प्रेशर बनाया हुआ है. जिसका भी काफी मानसिक तनाव है.
- खास बात तो ये है कि स्कीम बेचने वाले कर्मचारियों को उसका इंसेंटिव या यूं कहें कि कमीशन भी नहीं मिलता ह.
- बैंक में काम करने वाले कर्मचारियों पर पब्लिक डीलिंग का काफी प्रेशर है, जो पहले एक कर्मचारी लोगों को संभालता था, वो अब 25 से 30 देख रहा है.
- कर्मचारियों को टारगेट पूरा करने के लिए छुट्टियों के दिन भी अनऑफिशियली बैंक ब्रांच में बुलाया जाता है.
- अगर बैंकों की दो से तीन दिनों की छुट्टियां हैं, तो उन्हें स्टेशन छोड़ने की परमीशन नहीं है, इसके लिए स्पेशल परमीशन लेनी पड़ती है.
बैंकों के वर्कफोर्स में भारी कमी
बीते एक दशक से ज्यादा समय से सरकारी बैंकों के वर्कफोर्स में भारी कमी देखने को मिली है. आरबीआई के डाटा के अनुसार वित्त वर्ष 2012—13 में सरकारी कर्मचारियों की संख्या 886,490 थी, जोकि वित्त वर्ष 2025—26 में 7.63 लाख था. इसका मतलब है कि इन 13 सालों में सरकारी बैंकों का वर्कफोर्स करीब 1 लाख से ज्यादा कम हो गया है. जोकि एक बड़ी गिरावट है. वैसे बीते दिनों एक रिपोर्ट आई थी. जिसमें कहा गया था कि पिछले साल के मुकाबले में सरकारी बैंकों के वर्कफोर्स में इजाफा देखने को मिला है. वित्त वर्ष 2025 में जहां सरकारी बैंकों में वर्कफोर्स की संख्या लाख थी, उसमें करीब 14 हजार का इजाफा देखने को मिला है. खास बात तो ये है कि सरकारी बैंक के वर्कफोर्स में लगातार दूसरे साल इजाफा देखने को मिला है. वित्त वर्ष 2024 में सरकारी बैंकों का वर्कफोर्स 7.47 लाख से बढ़कर 7.49 लाख हो गया था.



