सिंगापुर टेलीकम्युनिकेशन्स भारत में सैटेलाइट कम्युनिकेशन से जुड़ी सर्विस शुरू करने की योजना बना रही है. इस तरह वह देश के अभी शुरुआती दौर वाले, लेकिन बहुत संभावनाओं वाले सैटकॉम मार्केट में कदम रखने वाली नई ग्लोबल कंपनी बन जाएगी. मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि Singtel का प्लान सिंगापुर टेलीकॉम इंडिया के जरिए सरकारी और प्राइवेट कंपनियों को अपनी सैटकॉम सर्विस देना है. लोगों ने बताया कि कंपनी ने अपनी इस योजना के लिए केंद्र सरकार से फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट की मंजूरी मांगी है. जानकारी देने वाले एक व्यक्ति ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि हालांकि STIPL भारत में दो दशकों से ज्यादा समय से काम कर रही है, लेकिन उसे FDI की नई मंजूरी की जरूरत है क्योंकि कंपनी सैटेलाइट कम्युनिकेशन से जुड़ी सर्विस को शामिल करके अपना दायरा बढ़ा रही है.

सिंगटेल के आवेदन पर विचार

सिंगापुर की सरकारी निवेश कंपनी टेमासेक होल्डिंग्स की इस कंपनी में बड़ी हिस्सेदारी है. यह कंपनी भारत की दूसरी सबसे बड़ी टेलीकॉम ऑपरेटर भारती एयरटेल में 26.85 फीसदी की डायरेक्ट और इनडायरेक्ट हिस्सेदारी रखती है. एक सरकारी अधिकारी ने पुष्टि की कि सिंगटेल के आवेदन पर विचार किया जा रहा है, लेकिन उन्होंने इस बारे में विस्तार से बताने से इनकार कर दिया.

एक दूसरे व्यक्ति ने मीडिया रिपोर्ट में कहा कि कंपनी लगभग 3638 जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स के ग्लोबल नेटवर्क का इस्तेमाल करके और एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक जैसी कंपनियों के साथ पार्टनरशिप करके सैटकॉम सर्विस देने की योजना बना रही है.

सिंगटेल के पास एक ऐसा प्लेटफॉर्म भी है जो GEO, MEO और LEO जैसे अलगअलग ऑर्बिट वाले सैटेलाइट्स को 4G/5G जैसे जमीनी फिक्स्ड और मोबाइल नेटवर्क के साथ जोड़ने की सुविधा देता है. यह भारत में सैटकॉम सर्विस शुरू करने की चाहत रखने वाली कंपनियों की लिस्ट में सबसे नया नाम है. इस लिस्ट में एलन मस्क की स्टारलिंक, जेफ बेजोस की अमेजन लियो, रिलायंस जियो और भारती ग्रुप की यूटेलसैट वनवेब जैसी कंपनियां शामिल हैं.

अभी तक कोई शुरू नहीं कर सर्विस

इनमें GEO, मीडियम और लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट्स के साथसाथ 4G/5G जैसे जमीनी फिक्स्ड और मोबाइल नेटवर्क शामिल हैं. यह भारत में सैटकॉम सर्विस शुरू करने की चाहत रखने वाली कंपनियों की लिस्ट में सबसे नया नाम है. इस लिस्ट में एलन मस्क की स्टारलिंक, जेफ बेजोस की अमेज़न लियो, रिलायंस जियो और भारती ग्रुप की यूटेलसैट वनवेब शामिल हैं, जो लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट्स का इस्तेमाल करके सर्विस देने की योजना बना रही हैं.

अकेले स्टारलिंक के पास ऐसे लगभग 11,000 सैटेलाइट्स हैं. सिक्योरिटी क्लीयरेंस न मिलने, स्पेक्ट्रम की कीमत तय न होने और पारंपरिक टेलीकॉम ऑपरेटरों के साथ रेगुलेशन को लेकर विवाद के कारण इनमें से कोई भी कंपनी भारत में सर्विस शुरू नहीं कर पाई है. खास बात यह है कि स्टारलिंक ने हाल ही में भारत सरकार से अपने Gen 2 LEO कॉन्स्टेलेशन के लिए मंजूरी मांगी है, जिसमें सीधे डिवाइस तक सर्विस पहुंचाने की क्षमता है.

भारत की स्पेस इकोनॉमी

अनुमान के मुताबिक, भारत की स्पेस इकॉनमी 2033 तक 44 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है, जिससे ग्लोबल मार्केट में इसकी हिस्सेदारी मौजूदा 2 फीसदी से बढ़कर 8 फीसदी हो जाएगी. पहले व्यक्ति ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि सिंगटेल अभी भारत में एक डीटीएच ऑपरेटर को ब्रॉडकास्टिंग सैटेलाइट कैपेसिटी दे रही है, जिसके लिए उसके पास जरूरी मंजूरी है.

सिंगटेल की वेबसाइट के मुताबिक, कंपनी ग्लोबल एंडटूएंड फिक्स्ड सैटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विस देती है. सैटेलाइट सेगमेंट के तहत मिलने वाले प्रोडक्ट्स और सर्विस में ट्रांसपोंडर लीज, टेलीपोर्ट होस्टिंग, सैटेलाइट ब्रॉडकास्ट, VSAT सर्विस और स्टारलिंक के जरिए कम लेटेंसी वाली कनेक्टिविटी शामिल है.

वहीं दूसरी ओर ईटी की रिपोर्ट में दूसरे जानकार ने कहा कि सिंगटेल ने स्पेस सेगमेंट में काफी निवेश किया है, खासकर भारत के लिए अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने के मकसद से. पहले व्यक्ति ने कहा कि भारत, सिंगटेल के स्पेस से जुड़े लक्ष्यों के लिए मुख्य बाजार बनने जा रहा है. भारतीय स्पेस सेक्टर में काफी हलचल देखी गई है, खासकर दिसंबर 2023 में ‘इंडियन स्पेस पॉलिसी’ के जरिए सरकार द्वारा इस सेक्टर को खोले जाने के बाद. इस कदम का मकसद इस सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों की भागीदारी को बढ़ावा देना था.

INSPACe से मंजूरी लेना जरूरी

नई पॉलिसी ने विदेशी कंपनियों को भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने और सैटेलाइट सर्विस देने की इजाजत दी है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। इस पॉलिसी ने स्पेस सेक्टर के रेगुलेटर ‘इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर’ को सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह की सैटकॉम कंपनियों की स्पेस गतिविधियों को मंजूरी देने वाली एकमात्र ‘सिंगलविंडो एजेंसी’ के तौर पर काम करने का अधिकार दिया है. जो भी कंपनी भारत में सैटकॉम सर्विस देना चाहती है, उसे INSPACe से मंजूरी, सैटेलाइट के ज़रिए ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन के लिए लाइसेंस और टेलीकम्युनिकेशन डिपार्टमेंट से स्पेक्ट्रम लेना होगा.