अक्सर हम अमीरी का मतलब बैंक बैलेंस और बड़ी गाड़ियों से लगाते हैं. लेकिन तमिलनाडु के एक इंसान ने दुनिया को बताया है कि असली अमीरी पैसों में नहीं, बल्कि बड़े दिल में होती है. इनका नाम है पालम कल्याणसुंदरम. पेशे से ये सिर्फ एक लाइब्रेरियन थे, लेकिन आज पूरी दुनिया इन्हें ‘भारत का सबसे अमीर गरीब’ कहती है. इस आम से इंसान ने अपनी 35 साल की पूरी सैलरी, रिटायरमेंट के बाद मिली पेंशन और इनाम की राशि मिलाकर कुल 30 करोड़ रुपये बेसहारा बच्चों के लिए दान कर दिए. खुद का पेट पालने के लिए उन्होंने होटलों में छोटेमोटे काम किए. आइए, इस महान इंसान की कहानी जानते हैं.

ऐसा गांव जहां माचिस तक नहीं मिलती थी
कल्याणसुंदरम का जन्म 1940 में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के एक बेहद पिछड़े गांव में हुआ था. गांव का नाम था मेलाकरिवेलमकुलम. इस गांव की हालत इतनी खराब थी कि वहां न पक्की सड़कें थीं, न बसें, न बिजली और न ही कोई स्कूल. यहां तक कि माचिस खरीदने के लिए भी कोई दुकान नहीं थी. बचपन में ही उनके पिता का साया सिर से उठ गया था. मां ने उन्हें अकेले पाला और जिंदगी का सबसे बड़ा सबक दिया ‘जब भी मौका मिले, हमेशा दूसरों की मदद करो.’ मां की यही एक बात कल्याणसुंदरम के दिल में हमेशा के लिए बस गई.
बच्चों की फीस भी खुद भरने लगे
उस दौर में पढ़ाईलिखाई के लिए उन्हें रोज 10 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता था और फिर 10 किलोमीटर वापस आना होता था. अकेले इतना लंबा रास्ता तय करना काफी मुश्किल होता था, इसलिए उन्होंने गांव के बाकी बच्चों को भी अपने साथ स्कूल ले जाना शुरू कर दिया. उस वक्त स्कूल की फीस सिर्फ 5 रुपये थी, लेकिन गांव के गरीब लोगों के पास इतने पैसे भी नहीं होते थे. कल्याणसुंदरम ने बचपन में ही फैसला कर लिया कि वो इन बच्चों की फीस भरेंगे. उन्होंने खुद ही उन गरीब बच्चों के लिए किताबें और कपड़े खरीदना शुरू कर दिया.
जीवन भर की कमाई कर दी दान
कल्याणसुंदरम पढ़ने में बहुत तेज थे. साहित्य और इतिहास पढ़ने के बाद उन्होंने लाइब्रेरी साइंस में मास्टर्स किया और गोल्ड मेडल जीता. पढ़ाई पूरी होते ही उन्हें थूथुकुडी जिले के एक कॉलेज में लाइब्रेरियन की पक्की सरकारी नौकरी मिल गई. जब पहली सैलरी हाथ में आई, तो उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जो इतिहास बन गया. उन्होंने तय किया कि वो अपनी हर महीने की सैलरी गरीब और अनाथ बच्चों को दान कर देंगे. यह सिलसिला 35 सालों तक चला. जीवन भर की सैलरी, पेंशन और दुनिया भर से मिले पुरस्कारों की रकम मिलाकर उन्होंने कुल 30 करोड़ रुपये दान कर दिए. खुद के गुजारे और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए वे नौकरी के बाद होटलों और लॉन्ड्री में काम करते थे.
देश के लिए दे दी सोने की चेन
देश और समाज के लिए उनका प्यार सिर्फ यहीं नहीं रुका. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। बात 1962 की है, जब भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था. उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लोगों से देश की मदद करने की अपील की थी. यह सुनकर कल्याणसुंदरम सीधे उस समय के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. कामराज के पास पहुंच गए. उन्होंने अपने गले में पहनी सोने की चेन उतारकर देश के लिए दान कर दी. मुख्यमंत्री उनके इस जज्बे को देखकर हैरान रह गए और सबके सामने उन्हें सम्मानित किया.



