कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर से भारी उछाल देखने को मिल रहा है. पश्चिम एशिया में पिछले लगभग छह महीनों से चल रहा तनाव अब खत्म होने के बजाय और गहराता जा रहा है, जिससे दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. जब भी वैश्विक बाजार में तेल के दाम बढ़ते हैं, तो उसका सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ता है. ऐसे में कच्चे तेल का यह महंगा बैरल आने वाले दिनों में भारतीय उपभोक्ताओं के बजट पर भारी पड़ सकता है.

फिर से क्यों भड़कने लगी कच्चे तेल की आग?
बाजार में अचानक आई इस तेजी के पीछे के हालिया आंकड़ों को समझना जरूरी है. ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड वायदा 7 सेंट या 0.08 प्रतिशत की बढ़त के साथ 90.94 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है. वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड वायदा में भी 53 सेंट यानी 0.63 प्रतिशत का उछाल आया है, जिसके बाद यह 85.03 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है. ध्यान देने वाली बात यह है कि ब्रेंट और WTI क्रूड दोनों ही अपने शुरुआती कारोबारी सत्र में क्रमश: 30 जुलाई और 31 जुलाई के बाद के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं.
अमेरिकाईरान समझौते की खत्म हुई मियाद
इस पूरी उठापटक और कीमतों में लगी आग का सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच खत्म हुआ शांति समझौता है. दरअसल, 17 अगस्त को इन दोनों देशों के बीच हुए संघर्ष विराम की मियाद खत्म हो गई. इसी साल जून में वाशिंगटन और तेहरान ने एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे. इसका मकसद दोनों पक्षों को 60 दिनों का एक ऐसा समय देना था, जिसमें वे बातचीत के जरिए स्थायी शांति का रास्ता निकाल सकें. लेकिन यह समय सीमा बिना किसी नतीजे या नई डील के ही खत्म हो गई. इसके बाद से दोनों देशों के बीच का यह गतिरोध पहले से कहीं ज्यादा खराब हो गया है.
होर्मुज जलडमरूमध्य का मंडराता खतरा
समझौता टूटने के बाद से हालात तेजी से बदल रहे हैं. ईरान ने अब पहले के मुकाबले काफी आक्रामक रुख अपना लिया है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संघर्ष विराम को आगे बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है. उनका स्पष्ट कहना है कि वह मोहलत सिर्फ इसलिए दी गई थी ताकि तय समय सीमा के भीतर किसी सहमति पर पहुंचा जा सके. इसके अलावा, आईएनजी के विश्लेषकों ने अपने एक नोट में बताया है कि ट्रंप के इस फैसले के साथसाथ होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा को लेकर लगातार बनी हुई चिंताओं ने भी बाजार की धारणा को प्रभावित किया है. इसी भूराजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों को लगातार समर्थन मिल रहा है.
भारत के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है. तनाव के कारण जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो उसका मतलब है आयात बिल में बढ़ोतरी. ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ती है, जिसका असर रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के दाम पर पड़ता है.



