China: खाना छोड़िए, साफ पानी तक नहीं था, गरीबी के दिनों में कैसा था चीन का हाल?​

News Just Abhi ईरान से चल रहे तनाव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने प्रतिद्वंद्वी चीन के दौरे पर हैं. वहां उनका जोरदार स्वागत हुआ. वे राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक कर द्विपक्षीय वार्ता करेंगे. उनके साथ एक बड़ा प्रतिनिधि मण्डल भी है. आज सबसे ताकतवर देश के रूप में मशहूर अमेरिका जिस चीन को खतरा मानता है, वह कभी बहुत गरीब था. खाने के लाले थे. पीने का पानी तक नहीं था लेकिन अपनी जीजिविषा, मेहनत और तकनीक से युगलबंदी करके चीन इतना आगे बढ़ गया है कि दोस्त और दुश्मन, दोनों उसकी ओर ललचाई नजरों से देख रहे हैं.

China: खाना छोड़िए, साफ पानी तक नहीं था, गरीबी के दिनों में कैसा था चीन का हाल?​
China: खाना छोड़िए, साफ पानी तक नहीं था, गरीबी के दिनों में कैसा था चीन का हाल?​

आइए, इसी बहाने जानते हैं कि आज का बेहद सम्पन्न चीन जब बहुत गरीब था तो उसकी हालत कैसी थी? वहाँ के लोगों का जीवन कितना मुश्किल था? कैसे यह देश गरीब से अमीर हो गया?

बड़ी दिलचस्प चीन की विकास यात्रा

आज का चीन दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है. शहर आधुनिक हैं. उसके पास बड़े उद्योग हैं. तेज रेल है. उसके पास विशाल निर्यात तंत्र है. पर चीन हमेशा ऐसा नहीं था. एक समय ऐसा भी था जब वहां बहुत गहरी गरीबी थी. करोड़ों लोग भूख, बीमारी और असुरक्षा में जीते थे. कई इलाकों में साफ पानी की कमी थी. खेती कमजोर थी. उद्योग बहुत कम थे. देश युद्ध, राजनीतिक उथलपुथल और गलत नीतियों से जूझ रहा था. चीन की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि उसने बहुत नीचे से उठकर विकास की बड़ी छलांग लगाई. यह बदलाव एक दिन में नहीं हुआ. दशकों लगे. इसमें गलतियां भी हुईं. सुधार भी हुए. इस पूरी यात्रा को समझना जरूरी है.

एक समय ऐसा भी था जब चीन में बहुत गरीबी थी.

जब चीन बहुत गरीब था, तब कैसा था?

बीसवीं सदी के पहले आधे हिस्से में चीन बहुत कठिन दौर से गुजर रहा था. देश लंबे समय तक अस्थिर रहा. पहले साम्राज्य कमजोर हुआ. फिर अंदरूनी संघर्ष बढ़े. कई क्षेत्रों पर स्थानीय ताकतों का दबदबा था. फिर जापान के साथ युद्ध हुआ. उसके बाद गृहयुद्ध चला. इन सबने देश की अर्थव्यवस्था तोड़ दी. गांवों में हालत और खराब थे. खेती पुराने तरीकों से होती थी. उत्पादन कम था. किसान गरीब थे. जमीन का बंटवारा असमान था. बहुत लोग कर्ज में डूबे थे. बाढ़, सूखा और प्राकृतिक आपदाएं भी बारबार नुकसान करती थीं. परिवहन कमजोर था. इसलिए जहां अनाज था, वहां से जरूरत वाले इलाकों तक उसे पहुंचाना भी कठिन था.

शहरों में भी बहुत समृद्धि नहीं थी. कुछ बंदरगाह शहर जरूर सक्रिय थे, पर पूरे देश में उद्योग बहुत सीमित थे. मशीनें कम थीं. तकनीक कम थी. शिक्षा का स्तर भी कमजोर था. स्वास्थ्य सेवाएं भी बहुत कम लोगों तक पहुंचती थीं.

सबसे बुरे हालात कब थे?

अगर सबसे बुरे दौर की बात करें, तो चीन के लिए 1958 से 1962 के बीच का समय बहुत भयावह माना जाता है. इस दौर को आमतौर पर ग्रेट लीप फॉरवर्ड के समय का संकट कहा जाता है. यही वह समय था जब बड़े पैमाने पर खाद्य संकट और अकाल जैसी स्थिति पैदा हुई. उस समय सरकार ने बहुत तेजी से औद्योगिक और कृषि उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की. सामूहिक खेती को आगे बढ़ाया गया. गांवों को बड़े कम्यून में बदला गया. कई जगह उत्पादन के आंकड़े बढ़ाकर बताए गए. ऊपर तक गलत जानकारी गई. नीति उसी आधार पर बनी. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। राज्य ने अनाज की खरीद भी कई जगह वास्तविक उत्पादन से अधिक कर ली.

चीन के लिए 1958 से 1962 के बीच का समय बहुत भयावह माना जाता है.

नतीजा यह हुआ कि गांवों में लोगों के पास खाने को अनाज कम बचा. इसी दौरान मौसम की मार भी पड़ी. प्रशासनिक गलतियां हुईं. यह सब मिलकर भारी त्रासदी में बदल गया. लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन पर इसका असर पड़ा. कई शोधों में इस दौर को आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े मानवीय संकटों में गिना जाता है.

खाने का अकाल और पानी की समस्या

चीन का संकट केवल अनाज तक सीमित नहीं था. कई इलाकों में पीने के साफ पानी की भी कमी थी. ग्रामीण क्षेत्रों में कुएं, तालाब और स्थानीय जलस्रोत ही सहारा थे. सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था बहुत कमजोर थी. इससे बीमारियां फैलती थीं. कुपोषण और संक्रमण साथसाथ चलते थे. उत्तरी चीन के कुछ हिस्सों में जल संकट पुरानी समस्या रही है. वहां पानी सीमित था. दक्षिण में पानी अपेक्षाकृत ज्यादा था, पर बाढ़ और जल प्रबंधन की अपनी समस्याएं थीं. यानी चीन के पास पानी था, पर उसका वितरण और प्रबंधन संतुलित नहीं था. गरीब देश होने के कारण बड़े स्तर पर जल ढांचा बनाना आसान नहीं था.

फिर बदलाव कैसे शुरू हुआ?

चीन में बड़ा मोड़ 1978 के बाद आया. यह वह दौर था जब देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में आर्थिक सुधार शुरू हुए. चीन ने यह समझ लिया कि केवल नारे और कठोर नियंत्रण से समृद्धि नहीं आएगी. उत्पादन बढ़ाना होगा. लोगों को काम और कमाई का प्रोत्साहन देना होगा. दुनिया के साथ व्यापार बढ़ाना होगा. यहीं से चीन ने धीरेधीरे अपनी आर्थिक सोच बदली. उसने पूरी तरह पुरानी व्यवस्था नहीं छोड़ी, लेकिन उसमें बड़े सुधार किए. यही चीन की ताकत बनी. उसने अचानक सब कुछ नहीं बदला. उसने चरणबद्ध सुधार किए.

देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में चीन में आर्थिक सुधार शुरू हुए.

कृषि सुधार ने पहली राहत दी

सबसे पहले असर खेती में दिखा. चीन ने किसानों को ज्यादा जिम्मेदारी और कुछ हद तक स्वतंत्रता दी. इसमें परिवारों को जमीन उपयोग के आधार पर उत्पादन की जिम्मेदारी दी गई. वे तय सीमा तक राज्य को अनाज देते थे. उससे अधिक उत्पादन पर उन्हें लाभ मिल सकता था. इससे किसानों को मेहनत का सीधा फायदा दिखने लगा. उत्पादन बढ़ा. गांवों में आय बढ़ी. खाद्य संकट कम हुआ. यह बहुत बड़ा बदलाव था. जब पेट भरने लगा, तभी आगे की आर्थिक यात्रा संभव हुई.

उद्योग और व्यापार की ओर बड़ा कदम

खेती के बाद चीन ने उद्योग पर जोर बढ़ाया. उसने कुछ खास इलाकों में स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाए. इन क्षेत्रों में विदेशी निवेश को आकर्षित किया गया. नियम कुछ हद तक लचीले किए गए. कंपनियों को उत्पादन, निर्यात और रोजगार के मौके दिए गए. चीन ने दुनिया के लिए सस्ता और बड़े पैमाने पर सामान बनाना शुरू किया. कपड़ा, खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनें और बाद में हाईटेक उत्पाद भी बनने लगे. विदेशों से पूंजी आई. तकनीक आई. प्रबंधन के नए तरीके आए. इससे चीन का औद्योगिक आधार मजबूत होता गया.

सस्ता श्रम, अनुशासन और राज्य की भूमिका

चीन के पास बड़ी आबादी थी. लंबे समय तक मजदूरी पश्चिमी देशों की तुलना में कम थी. इससे चीन दुनिया का विनिर्माण केंद्र बनने लगा. पर केवल सस्ता श्रम ही कारण नहीं था. चीन ने सड़कें बनाईं. बंदरगाह बनाए. बिजली पहुंचाई. औद्योगिक क्लस्टर तैयार किए यानी सरकार ने बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया. राज्य की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही. चीन ने बाजार को जगह दी, पर उसे पूरी तरह खुला और अनियंत्रित नहीं छोड़ा. कई क्षेत्रों में सरकार ने दिशा तय की. बैंकिंग, भूमि, ऊर्जा और बड़े उद्योगों पर उसका प्रभाव बना रहा. इससे वह बड़े लक्ष्य तय कर सका.

खेती के बाद चीन ने उद्योग पर जोर बढ़ाया तो आर्थिक हालात बेहतर हुए.

शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव पूंजी

समृद्धि केवल फैक्टरी से नहीं आती. लोगों की क्षमता भी जरूरी होती है. चीन ने धीरेधीरे शिक्षा का विस्तार किया. साक्षरता बढ़ी. तकनीकी प्रशिक्षण बढ़ा. स्कूल और विश्वविद्यालय मजबूत किए गए. इसी तरह बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं में भी सुधार हुआ. इससे श्रम शक्ति अधिक सक्षम हुई. जब एक गरीब समाज में शिक्षा बढ़ती है, तो उत्पादकता भी बढ़ती है. चीन ने यही किया. उसने गांव से शहर तक लोगों को आर्थिक प्रक्रिया से जोड़ा. करोड़ों लोग खेती से निकलकर उद्योग और सेवा क्षेत्र में आए. यह दुनिया के सबसे बड़े सामाजिकआर्थिक बदलावों में से एक था.

शहरों का विकास और निर्यात मॉडल

चीन ने शहरीकरण को भी विकास का साधन बनाया. नए शहर बने. पुराने शहरों का विस्तार हुआ. बड़ी संख्या में लोग ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर गए. वहां उन्हें फैक्ट्रियों, निर्माण, परिवहन और सेवाओं में काम मिला. निर्यात आधारित विकास मॉडल ने चीन को तेज गति दी. दुनिया भर की कंपनियों ने चीन में उत्पादन कराया. चीन ने धीरेधीरे केवल सस्ते सामान तक खुद को सीमित नहीं रखा. उसने मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल, दूरसंचार उपकरण और उन्नत विनिर्माण में भी प्रवेश किया.

निर्यात के विकास मॉडल ने चीन को तेज गति दी और दुनिया भर की कंपनियों ने चीन में उत्पादन कराया.

क्या सब कुछ आसान था?

चीन की यात्रा आसान नहीं थी. इसके साथ कई समस्याएं भी रहीं. गांव और शहर के बीच असमानता रही. पर्यावरण प्रदूषण बढ़ा. श्रमिकों पर दबाव रहा. कुछ क्षेत्रों में आय का अंतर बहुत बढ़ा. जल संकट आज भी चीन के कई हिस्सों में चुनौती है. फिर भी, कुल मिलाकर देश ने भारी गरीबी को बहुत बड़े स्तर पर घटाया. दुनिया के कई अध्ययनों में माना गया है कि चीन ने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला. यह उपलब्धि बहुत बड़ी है. हालांकि, इसका मॉडल हर देश पर वैसा ही लागू नहीं हो सकता, क्योंकि हर देश की राजनीति, समाज और संसाधन अलग होते हैं.

कहा जा सकता है कि चीन धीरेधीरे समृद्ध बना. उसकी सफलता का संदेश साफ है. केवल संसाधन काफी नहीं होते. सही नीति, उत्पादन, अनुशासन, ढांचा और लंबे समय की योजना भी जरूरी होती है. चीन ने गलतियों से सीखा. फिर रास्ता बदला. यही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी. यही प्रेरणा बनी.

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