लखनऊ : जोड़ों का दर्द और अकड़न सिर्फ़ बुढ़ापे की समस्या नहीं है। रीजेंसी हेल्थ लखनऊ के विशेषज्ञ कम उम्र के लोगों से अपील कर रहे हैं कि जोड़ो के दर्द के जब लक्षण बने रहें या रोज़मर्रा के कामों में रुकावट डालने लगें, तो वे मेडिकल जांच करवाएं। वैसे तो अर्थराइटिस आमतौर पर बढ़ती उम्र में होता है, लेकिन जोड़ों की समस्याएँ ज़िंदगी में कम उम्र में भी हो सकती हैं, खासकर उन लोगों में जिन्हें पहले चोट लगी हो, वज़न ज़्यादा हो, बारबार शारीरिक तनाव हो या कुछ सूजन वाली बीमारियाँ हों, उनमें जोड़ो की समस्याओं के होने का ख़तरा ज़्यादा होता है।

यह चिंता खासकर स्पोर्ट्स और दूसरी हाईइम्पैक्ट फिजिकल एक्टिविटीज़ में शामिल युवाओं के बीच ज़्यादा है। 2025 में लखनऊ में 5 स्पोर्ट्स एकेडमी और ट्रेनिंग सेंटर में 14 से 30 साल के 400 एथलीटों पर की गई एक स्टडी में पाया गया कि 48.5% को खेल से जुड़ी चोट लगी थी, जबकि रिपोर्ट की गई सभी चोटों में से 61.3% निचले अंगों की चोटें थीं। घुटने और टखने की चोटें सबसे ज्यादा प्रभावित अंगों में से थीं। खेल के दौरान लगी चोट से आर्थराइटिस होना ज़रूरी नहीं है, लेकिन अगर पहले कभी जोड़ में चोट लगी हो, तो बारबार होने वाले दर्द या अकड़न को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
रीजेंसी लखनऊ के आर्थोपेडिक्स डिपार्टमेंट के सीनियर कंसलटेंट डॉ रोहित जैन ने कहा, “कोई जवान है, सिर्फ़ इसलिए अर्थराइटिस को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। जोड़ों के लक्षणों के अलगअलग कारण हो सकते हैं, जैसे पहले लगी चोट, मैकेनिकल स्ट्रेस और सूजन की समस्या, और खुद से दवा लेने से असली कारण का पता नहीं चल सकता। अगर दर्द बारबार होता है या चलनेफिरने में परेशानी होने लगती है, तो जांच कराने से इसकी वजह पता लगाने और सही इलाज शुरू करने में मदद मिल सकती है। इससे पहले कि यह समस्या रोज़मर्रा के कामों में ज़्यादा परेशानी पैदा करे , जल्दी जांच कराएं और इलाज़ शुरू करें।”
रोज़मर्रा की कई वजहों से जोड़ों पर ज़्यादा ज़ोर पड़ सकता है। पहले खेल या काम की जगह पर लगी चोटें, अचानक ज़्यादा एक्सरसाइज़ करना, एक्सरसाइज़ करने का खराब तरीका, लंबे समय तक एक्टिव न रहना और शरीर का ज़्यादा वज़न, ये सभी जोड़ों में खिंचाव पैदा कर सकते हैं। घुटनों जैसे जोड़ों पर शरीर का ज़्यादा वजन पड़ता है, इसलिए उन पर ज्यादा असर हो सकता है। ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। इसके अलावा मांसपेशियां कमज़ोर होने से जोड़ों को मिलने वाला सहारा भी कम हो जाता है।
कुछ लक्षणों के लिए खुद से दवा करने के बजाय मेडिकल जांच करवानी चाहिए। इन लक्षणों में बारबार होने वाला दर्द, जोड़ के आसपास सूजन या गर्मी दिखना, जागने या ज़्यादा देर आराम करने के बाद अकड़न, हिलनेडुलने की क्षमता कम होना, और सीढ़ियां चढ़ने, चलने या कुर्सी से उठने जैसी गतिविधि में परेशानी होना शामिल हैं। कई जोड़ों में दर्द या ऐसे लक्षण जो धीरेधीरे बिगड़ते जाते हैं, उनकी भी जांच ज़रूरी होती है।
जोड़ों की सेहत नियमित, सही शारीरिक गतिविधि, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, स्वस्थ शरीर का वजन बनाए रखने और एक्सरसाइज के बाद ठीक से रिकवरी करने से बेहतर होती है। जो चोटें उम्मीद के मुताबिक ठीक नहीं होतीं, उन्हें भी नज़रअंदाज करने के बजाय जांचना चाहिए, खासकर जब दर्द, अकड़न या मूवमेंट में रुकावट बनी रहे तो जांच में देरी नहीं करनी चाहिए।
जोड़ों की समस्याएं किसी भी उम्र में व्यक्ति के चलनेफिरने, काम करने और सक्रिय रहने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। इससे जीवन की गुणवत्ता भी खराब हो सकती है। इसलिए उम्र चाहे जो भी हो, लक्षण दिखने पर समय रहते ध्यान देना ज़रूरी है। रीजेंसी हेल्थ लखनऊ उन युवा वयस्कों को सलाह देता है जिन्हें जोड़ों में लगातार या बिना किसी स्पष्ट कारण के कोई समस्या हो रही है, कि वे जल्द से जल्द डॉक्टर से जांच करवाएं। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि समस्या की असली वजह का पता चल सके और उसका सही तरीके से इलाज हो |



