आपका कुत्ता नहीं जानता कि आपके पास कितना पैसा है. उसे यह भी फर्क नहीं पड़ता कि आपका घर बड़ा है या छोटा, आपकी कार महंगी है या साधारण, आपके कपड़े किसी बड़े ब्रांड के हैं या नहीं. उसे यह भी नहीं पता कि आपका काम क्या है, कितने लोग आपका सम्मान करते हैं या दुनिया आपको कितना सफल मानती है. उसे यह भी नहीं मालूम कि आज आपने क्या हासिल किया. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। फिर भी जब आप घर का दरवाजा खोलते हैं, वह ऐसे आपकी तरफ दौड़ सकता है जैसे पूरे दिन की सबसे अच्छी खबर आप ही हों. उसके लिए आपका आ जाना ही काफी है.

इस तरह का प्यार हमें भीतर से थोड़ा असहज भी कर सकता है, क्योंकि इंसानों ने प्यार को बहुत जटिल बना दिया है. हम किसी को अपने दिल में जगह देने से पहले कई सवाल पूछते हैं. उसके पास क्या है? वह मेरे लिए क्या कर सकता है? समाज में उसकी जगह क्या है? उससे जुड़कर मुझे क्या मिलेगा? धीरेधीरे हमने इंसान को उसके नाम, काम और पहचान से देखना शुरू कर दिया और उसके पीछे खड़े इंसान को देखना भूल गए.
इस रिश्ते से मुझे क्या मिल रहा है?
एक बच्चा जिंदगी की शुरुआत ऐसे नहीं करता. वह यह नहीं पूछता कि उसकी मां के पास कितना पैसा है. वह अपने पिता की सामाजिक हैसियत नहीं समझता. उसे यह भी नहीं मालूम कि उसका घर बड़ा है या छोटा. वह बस इतना जानता है कि उसका हाथ कौन पकड़ता है. फिर धीरेधीरे दुनिया उसे दूसरी भाषा सिखाती है. नंबर जरूरी हो जाते हैं. कपड़े जरूरी हो जाते हैं. नौकरी जरूरी हो जाती है. पैसा जरूरी हो जाता है. सफलता जरूरी हो जाती है.
यहां तक कि दोस्ती में भी कभीकभी एक अदृश्य हिसाब शुरू हो जाता है. हम शायद इसे शब्दों में नहीं कहते, लेकिन भीतर कहीं पूछने लगते हैं, इस रिश्ते से मुझे क्या मिल रहा है? और बिना किसी कागज पर दस्तखत किए प्यार भी एक लेनदेन जैसा बनने लगता है.
हर दिन कुछ साबित करने की जरूरत
शायद इसीलिए कुत्ते का स्वागत हमें इतना गहराई से छूता है. वह हमें कुछ ऐसा दिखाता है जिसे हम भूल गए हैं. वह उस इंसान से नहीं मिलता जिसने आज जीत हासिल की है. वह उस इंसान से मिलता है जो घर वापस आया है. दरवाजे पर कोई इंटरव्यू नहीं होता. कोई सफाई नहीं देनी पड़ती. आप एक बहुत खराब दिन के बाद घर लौट सकते हैं, चुपचाप बैठ सकते हैं, कुछ भी नहीं कह सकते, फिर भी आपको वही अपनापन मिलता है. सोचिए, अगर इंसानी रिश्तों में भी ऐसा ही नियम होता कि अपनेपन के लिए आपको हर दिन कुछ साबित करने की जरूरत न होती.
हम प्यार के लायक हैं?
इसके भीतर एक अजीबसा मनोवैज्ञानिक विरोधाभास है. जितना ज्यादा हम यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि हम प्यार के लायक हैं, उतना ही हमें डर लगने लगता है कि कहीं वह प्यार हमसे छिन न जाए. हम अपनी बनाई हुई छवि को बचाने लगते हैं. असफलता छिपाते हैं क्योंकि डरते हैं कि कोई हमें अलग नजर से देखने लगेगा. कमजोरी छिपाते हैं क्योंकि लगता है कि लोग हमारा सम्मान करना बंद कर देंगे.
दुनिया को हमारा सफल चेहरा ही पसंद
दुख छिपाते हैं क्योंकि हमें लगता है कि दुनिया को हमारा सफल चेहरा ही पसंद है. धीरेधीरे हम उन लोगों के बीच भी अपने असली रूप से दूर हो जाते हैं, जो हमारे सबसे करीब हैं. लोग उस इंसान से प्यार कर रहे होते हैं जिसे हम दुनिया को दिखाते हैं, जबकि भीतर हम किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे होते हैं जो उस इंसान को भी स्वीकार कर ले जिसे हम वास्तव में हैं.
इंसान की असली कीमत
पुराना ज्ञान हमें अलगअलग शब्दों में यही बात समझाता रहा है कि इंसान की असली कीमत केवल उन चीजों से तय नहीं होती जिन्हें वह रख सकता है, दिखा सकता है या गिन सकता है. कोई अपना पैसा खो सकता है और फिर भी वही इंसान रह सकता है. कोई अपना पद खो सकता है और फिर भी वही इंसान रह सकता है. कोई तालियां खो सकता है और शायद पहली बार खुद को पा सकता है. जिन चीजों को जमा करने में हम पूरी जिंदगी लगा देते हैं, वे एक पल में चली जा सकती हैं. लेकिन देखे जाने, स्वीकार किए जाने और प्यार किए जाने की जरूरत बचपन से बुढ़ापे तक हमारे भीतर रहती है.
जब आपका अपना कोई इंसान घर लौटे
आज रात एक छोटासा प्रयोग कीजिए. जब आपका अपना कोई इंसान घर लौटे, तो उससे यह मत पूछिए कि आज उसने क्या हासिल किया, क्या खरीदा, क्या गलत हुआ या क्या काम अभी बाकी है. उसकी तरफ देखिए. उसकी आवाज सुनिए. उसके थके हुए चेहरे को देखिए. कुछ मिनटों के लिए उसे बिना कोई सफाई दिए बस रहने दीजिए. शायद तब आप समझेंगे कि कई बार प्यार वह चीज नहीं है जो हम किसी को देते हैं. प्यार वह जगह है जो हम किसी के लिए बनाते हैं, जहां उसे हर दिन कुछ साबित नहीं करना पड़ता.
मन में असफलता, पछतावा, शर्म और अधूरे काम
और शायद यही काम हमें अपने साथ भी करना चाहिए. ऐसे दिन आते हैं जब हम अपने ही मन में असफलता, पछतावा, शर्म और अधूरे काम लेकर लौटते हैं. फिर हम खुद से सवाल शुरू कर देते हैं. तुमने ऐसा क्यों किया? यह क्यों नहीं किया? तुम अभी तक यहां क्यों हो? तुम और बेहतर क्यों नहीं हो? लेकिन अगर एक शाम हम यह पूछताछ रोक दें तो? अगर हम खुद से सिर्फ इतना कहें, आज दिन मुश्किल था. अंदर आ जाओ. बैठो. तुम अभी भी यहां हो.
कुत्ते को हमारी तनख्वाह, हमारा काम या हमारी प्रतिष्ठा नहीं मालूम. शायद इसी वजह से उसका स्वागत हमें वह बात सिखा सकता है जो उपलब्धियां नहीं सिखा पातीं. वह याद दिलाता है कि सफल, असफल, महत्वपूर्ण, साधारण, अमीर या गरीब बनने से पहले हम सिर्फ इंसान थे. एक ऐसे स्थान की तलाश में, जहां हम बिना डर के लौट सकें.
चुपचाप हमारे भीतर इंतजार करता एक इंसान
शायद घर वह इमारत नहीं है, जिसमें हम दिन के अंत में प्रवेश करते हैं. शायद घर वह जगह है, जहां हमें अपने बारे में कुछ साबित नहीं करना पड़ता. पूरी जिंदगी दुनिया की नजरों में खुद को योग्य साबित करने के बाद, क्या हम कभी उस इंसान को पहचान पाएंगे जो चुपचाप हमारे भीतर इंतजार कर रहा है और केवल इतना पूछ रहा है, ‘क्या अब मैं घर आ सकता हूं?



