
सनातन धर्म में व्रतत्योहारों का विशेष महत्व माना जाता है। ऐसे ही हिंदू धर्म में कोकिला व्रत का खास महत्वपूर्ण है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि से इस व्रत का आरंभ होता और इसका समापन श्रावण पूर्णिमा तिथि पर होता है। कोकिला व्रत सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए करती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत को शिवजी जैसा वर प्राप्ति की कामना करती हैं।
यह व्रत आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा तिथि से शुरु होकर पूरे एक माह तक चलता है। इस व्रत में देवी पार्वती के कोकिला यानी कोयल स्वरुप और शिवजी की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कोकिला व्रत करने से महिलाओं को सुख, सौभाग्य और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। आइए आपको बताते हैं कोकिला व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसका महत्व।
कोकिला व्रत कब है?
कोकिला व्रत आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा तिथि से लेकर श्रावण पूर्णिमा तक रखा जाता है। पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 28 जुलाई, मंगलवार को शाम के 6 बजकर 19 मिनट पर होगा। इसके अगले दिन यानी 29 जुलाई, बुधवार को रात 8 बजकर 6 मिनट तक पूर्णिमा तिथि रहेगी। उदया तिथि के अनुसार, 29 जुलाई से कोकिला व्रत की शुरुआत हो रही है और श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त, गुरुवार को सुबह 9 बजकर 9 मिनट से शुरू होगी और अगले दिन यानी 28 अगस्त, शुक्रवार को सुबह 9 बजकर 49 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, 28 अगस्त को कोकिला व्रत समाप्त होता है और इसी दिन रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाएगा।
कोकिला व्रत मुहूर्त
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा तिथि आरंभ 28 जुलाई, मंगलवार को शाम के 6 बजकर 19 मिनट पर
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा तिथि समाप्त 29 जुलाई, बुधवार को रात में 8 बजकर 6 मिनट पर
कोकिला व्रत की शुरुआत 29 जुलाई, बुधवार
श्रावण पूर्णिमा तिथि आरंभ 27 अगस्त, गुरुवार को सुबह 9 बजकर 9 मिनट पर
श्रावण पूर्णिमा तिथि समाप्त 28 अगस्त, शुक्रवार को सुबह 9 बजकर 49 मिनट पर
कोकिला व्रत का समापन 28 अगस्त, शुक्रवार
क्या है कोकिला व्रत?
कोकिला व्रत का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है। धार्मिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव के अपमान से व्यथित होकर माता सती ने अपना देह योगाग्नि में त्याग दिया था। जिसके बाद उन्हें कुछ समय तक कोयल के रुप में रहना पड़ा। फिर उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर में माता पार्वती के रूप में जन्म लिया और कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव को पुनः पति के रुप में प्राप्त किया। इसलिए यह व्रत शिवपार्वती के अटूट दांपत्य और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
कोकिला व्रत पूजा विधि
इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि करके साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। जिसके बाद दिन की शुरुआत में सूर्य को अर्घ्य दें।
सबसे पहले व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद माता पार्वती और शिवजी की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। कुछ जगहों पर मिट्टी से कोयल की प्रतिमा भी बनाई जाती है। यह प्रतिमा देवी पार्वती के प्रतीक रूप में स्थापित करती है। वहीं, पूजा और आरती के बाद इस मिट्टी से बनी कोयल की प्रतिमा श्रद्धापूर्वक ब्राह्मण या अपने सासससुर को दान में दी जाती है।
इसके बाद भगवान शिव को दूध और गंगाजल के साथ अभिषेक करें और उन्हें बेलपत्र व धतूरा अर्पित करें। साथ ही आप सफेद, लाल फूल, भांग, धूपदीप और अष्टगंध का उपयोग पूजा में करें।
अपनी क्षमता के अनुसार इस व्रत को निराहर रहकर पूरा कर सकते हैं। अगर संभव न हो तो आप एक समय फलाहार करके भी कोकिला व्रत कर सकते हैं।
वहीं, शाम के समय कोकिला व्रत में पूजा का खास महत्व बताया गया है। इस दिन शाम को विधिविधान से पूजा और आरती करें। शिवजी और मां पार्वती को भोग लगाएं।
शाम की पूजा करने के बाद ही व्रती को फलाहर करना चाहिए। इसके साथ ही, कोकिला व्रत का पाठ भी इस दिन जरुर करना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से अत्यंत शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
क्या है इस व्रत का धार्मिक महत्व?
असल में कोकिला व्रत सिर्फ मनचाहा वर पाने का ही नहीं, बल्कि धैर्य, निष्ठा,तप और वैवाहिक समपर्ण का प्रतीक भी है। यह व्रत भगवान शिव और पार्वती के आदर्श दांपत्य से जुड़ा हुआ है। इस व्रत से महिलाओं को श्रद्धा, संयम और सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीने का संदेश दिया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सच्चे मन और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत शुभ फलदायी माना जाता है।



