मैदानी राज्यों में सामान्य मानसूनी वर्षा अक्सर राहत देती है. लेकिन हिमालयी और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में यही बारिश कई बार जानलेवा बन जाती है. असम में बाढ़ ने कोहराम मचा रखा है. यह इलाका मैदानी और पहाड़ी दोनों हिस्सों में आता है. वहीं उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिमी घाट के पर्वतीय हिस्सों में हर वर्ष भूस्खलन, अचानक बाढ़, सड़क टूटने और मकान गिरने की घटनाएं सामने आती हैं. इस साल भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं. आइए, समझते हैं कि मैदानों में होने वाली सामान्य मानसूनी बारिश पहाड़ के लिए जानलेवा क्यों बन जाती है?

मैदानी इलाकों की जमीन अपेक्षाकृत समतल होती है. वहां बारिश का पानी फैल जाता है, मिट्टी में रिसता है या धीरेधीरे नालों और नदियों तक पहुंचता है. पहाड़ों में जमीन ढलानदार होती है. पानी रुकता नहीं है. वह तेज गति से नीचे की ओर बहता है. तेज बहाव मिट्टी, पत्थर, पेड़ और मलबा अपने साथ बहा ले जाता है. छोटी धाराएं कुछ ही समय में उफनती नदियों का रूप लेते हुए देखी जा सकती हैं. इसी कारण पहाड़ों में कम समय की तेज बारिश भी खतरनाक बन जाती है.
बंगाल की खाड़ी से चली नमी पहाड़ों के लिए खतरनाक
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि आजकल बंगाल की खाड़ी से बहुत बड़ी मात्रा में नमी उत्तर एवं उत्तरपश्चिम भारत की ओर आ रही हैं. यह प्रणाली दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे राज्यों में बारिश का कारण बन रही हैं. मैदानों में यह बारिश जहां फसलों की प्यास बुझा रही है. गर्मी से निजात मिल रही है तो यही बारिश पहाड़ों में भारी दिक्कत की वजह बनती हैं. असल में जब यह नम हवाएं जब हिमालय की ऊंची ढलानों से टकराती हैं तो वे तेजी से ऊपर उठती हैं. हवा ठंडी हो जाती है. और बहुत कम क्षेत्र में अत्यधिक बारिश का कारण बनती हैं. फिर बहुत कुछ ऐसा होता है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं करते. जो बारिश मैदानों में सुकून देती है वही बारिश पहाड़ी क्षेत्रों में भयावह स्वरूप लेते हुए देखी जाती है.
कई चट्टानें परतदार, टूटी हुई और कमजोर हैं. फोटो: Pexels
भूगर्भीय रूप से युवा और कमजोर है हिमालय
हिमालय दुनिया की सबसे नई पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता है. यह आज भी भूगर्भीय बदलावों से गुजर रहा है. यहां की कई चट्टानें परतदार, टूटी हुई और कमजोर हैं. भूकंप, कटाव और पानी के कारण ये चट्टानें आसानी से खिसकती हैं. जब बारिश का पानी चट्टानों की दरारों में भरता है, तो उनका आपसी पकड़ कमजोर हो जाती है. मिट्टी भी गीली होकर भारी हो जाती है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। फिर ढलान पर मौजूद मिट्टी, पत्थर और पेड़ नीचे की ओर फिसलने लगते हैं.
सबसे बड़ा खतरा है भूस्खलन
मानसून के दौरान पहाड़ों में भूस्खलन आम है. लगातार बारिश से मिट्टी पानी सोख लेती है. उसकी भार सहने की क्षमता कम हो जाती है. ढलान का संतुलन बिगड़ता है और जमीन का बड़ा हिस्सा खिसक जाता है. भूस्खलन से सड़कें बंद हो जाती हैं. वाहन दब जाते हैं. घर क्षतिग्रस्त होते हुए देखे जाते हैं. बिजली, पानी और संचार सेवाएं भी ठप होना आम है. कई स्थानों पर गांवों का संपर्क बाहरी दुनिया से कट जाता है. भूस्खलन केवल बहुत तेज बारिश से नहीं होता. कई बार कई दिनों तक होने वाली सामान्य बारिश भी मिट्टी को पूरी तरह संतृप्त कर देती है. इसके बाद हल्की बारिश, वाहन का कंपन या छोटा भूकंप भी भूस्खलन के लिए पर्याप्त होता है.
पहाड़ों पर होने वाली बारिश मलबा लेकर आती है, तस्वीर जम्मूकश्मीर के डोडा की है. फोटो: PTI
अचानक उफन जाती हैं छोटी नदियांनाले
पर्वतीय क्षेत्रों में नदियों और नालों का ढलान अधिक होता है. इसलिए पानी बहुत तेजी से नीचे की ओर बहता है. मैदानी नदी में पानी बढ़ने में समय लग सकता है, लेकिन पहाड़ी नाला कुछ मिनटों या घंटों में उफना सकता है. इसे फ्लैश फ्लड कहा जाता है. इसमें पानी के साथ बोल्डर, लकड़ी, मिट्टी और मलबा भी आता है. यह मिश्रण बेहद विनाशकारी होता है. यह पुलों को तोड़ सकता है, सड़कों को काट सकता है और नदी किनारे बने घरों को बहा सकता है. पहाड़ों में कई बस्तियां नदी घाटियों या नालों के पास बसी हैं. पर्यटन सुविधाएं भी अक्सर नदी किनारे विकसित की जाती हैं. बारिश के समय ये स्थान अधिक जोखिम में आ जाते हैं.
असम के मरिगांव की तस्वीर.
खतरे को कई गुना बढ़ा देता है बादल फटना
पहाड़ों में बादल फटने की घटनाएं खूब होती हैं. इसका अर्थ है कि बहुत छोटे क्षेत्र में बहुत कम समय में अत्यधिक बारिश होना. इससे नाले और छोटी नदियाँ अचानक भर जाती हैं. बादल फटना सामान्य मानसून से अलग चरम मौसमी घटना है. फिर भी पहाड़ी इलाकों की बनावट ऐसी है कि सामान्य बारिश और बादल फटने, दोनों के प्रभाव गंभीर हो सकते हैं. पहाड़ों में बारिश का अनुमान लगाना भी कठिन होता है, क्योंकि मौसम एक घाटी से दूसरी घाटी में तेजी से बदल सकता है.
जंगल का कटना बनाता है भयावह
पेड़पौधे पहाड़ों के प्राकृतिक रक्षक हैं. उनकी जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं. वनस्पति बारिश की बूंदों की सीधी मार को भी कम करती है. जंगल पानी को धीरेधीरे जमीन में रिसने में मदद करते हैं. जब जंगल कटते हैं, तो मिट्टी खुली रह जाती है. बारिश का पानी उसे आसानी से बहा ले जाता है. ढलान कमजोर होती है. नदियों में अधिक गाद और मलबा पहुँचता है. इससे नदी तल ऊपर उठ सकता है और बाढ़ का खतरा बढ जाता है. सड़क निर्माण, होटल, जलविद्युत परियोजनाएँ, खनन और अनियोजित शहरीकरण कई क्षेत्रों में वनावरण पर दबाव डालते हैं. विकास जरूरी है, लेकिन उसकी योजना पहाड़ की क्षमता को ध्यान में रखकर बनाने का समय है.
पहाड़ी क्षेत्रों में बाढ़ के बाद का हाल.
जरा सी चूक पड़ती है भारी
पहाड़ी सड़कों के लिए पहाड़ काटना पड़ता है. यदि कटान वैज्ञानिक तरीके से न हो, तो ढलान अस्थिर हो सकती है. कटे हुए मलबे को यदि नदी या ढलान पर डाल दिया जाए, तो वह बारिश में बहकर नीचे पहुंचता है. सड़क किनारे पर्याप्त नालियाँ, रिटेनिंग वॉल और ढलान सुरक्षा संरचनाएं जरूरी होती हैं. इनके बिना पानी सड़क के नीचे घुस सकता है. इससे सड़क धंस सकती है या पूरा हिस्सा बह सकता है. मानसून में सड़क बंद होने का मतलब केवल यात्रा रुकना नहीं है. इससे अस्पताल, राशन, दवाइयां, राहत सामग्री और आपात सेवाएं भी प्रभावित होती हैं.
बदल रहा है बारिश का पैटर्न
जलवायु परिवर्तन के कारण कई जगह बारिश का स्वरूप बदल रहा है. लंबे समय तक सूखा रह सकता है, फिर कम समय में बहुत तेज बारिश हो सकती है. ऐसी केंद्रित वर्षा पहाड़ों के लिए ज्यादा खतरनाक होती है. तापमान बढ़ने से वायुमंडल में अधिक नमी रह सकती है. यह तीव्र वर्षा की स्थितियों को बढ़ा सकती है. हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ, ग्लेशियर, झीलों और ढलानों पर इसके अलग प्रभाव पड़ते हैं. हालांकि, हर आपदा का कारण केवल जलवायु परिवर्तन नहीं होता, लेकिन यह पहले से मौजूद जोखिमों को बढ़ा सकता है.



