धूप और गर्मी से बचाने में सनस्क्रीन को सबसे बेस्ट माना जाता है. पर क्या आपने सोचा है कि आखिर सनस्क्रीन को लगाने की शुरुआत कैसे हुई थी? कैसे ये हमारे ब्यूटी रूटीन का हिस्सा बनती चली गई? सनस्क्रीन में मौजूद फॉर्मूला स्किन को सनबर्न और टैनिंग से बचाता है. सनस्क्रीन को इस्तेमाल करने वाला घर से बाहर इसे लगाए बिना नहीं निकलता है. सनस्क्रीन का काम स्किन को सूरज की यूवीए और यूवीबी किरणों से बचाना है. यूवीए किरण हमारी स्किन अंदर जाकर झुर्रियां और झाइयां बढ़ाती है. वहीं यूवीबी किरणों की वजह से स्किन पर लालपन या सनबर्न होता है. अगर ऐसा लगातार होता रहे तो टैनिंग हो जाती है.

सनस्क्रीन में दो फॉर्मूले फॉलो किए जाते हैं, जिसमें केमिकल और मिनरल शामिल है. इसके अलावा एसपीएफ और पीए+++ पर भी फोकस रखा जाता है. चलिए आपको बताते हैं इसका इतिहास और इससे जुड़ी दूसरी जरूरी बातें…

सनस्क्रीन का इतिहास । History of Sunscreen

हजारों सालों से स्किन को धूप से बचाने के लिए लोग कपड़ों, ऑलिव ऑयल और प्लांट्स की हेल्प लेते थे. 20वीं शताब्दी में जाकर सनस्क्रीन को लगाना शुरू किया गया. साल 2021 में पब्लिश हुई स्टडी जनरल प्रोसीडिंग में सनस्क्रीन की हिस्ट्री का जिक्र किया गया है. बताया जाता है कि स्विट्जरलैंड के केमिस्ट फ्रांज ग्रेटर ने 1938 में मॉर्डन सन प्रोटेक्शन की शुरुआत की. उन्हें पहाड़ पर चढ़ते हुए सनबर्न हो जाता था. इसी प्रॉब्लम ने उन्हें सनस्क्रीन बनाने के लिए मोटिवेट किया.

उस समय वेस्टर्न कल्चर में टैन बॉडी को सिंबल ऑफ हेल्थ और लग्जरी माना जाने लगा. लेकिन लोग चाहते थे कि इसमें उन्हें सनबर्न न हो. इसलिए उस दौरान टैनिंग ऑयल्स लाए गए जिनमें सनफिल्टरिंग प्रॉपर्टीज होती थी. ये समय 1930 का था.

वर्ल्ड वॉर 2 के सैनिकों के लिए सनब्लॉक

सनस्क्रीन को लगाने की असली शुरुआत का वर्ल्ड वॉर 2 से कनेक्शन है. दरअसल, उस समय सैनिको को हैवीड्यूटी सन प्रोटेक्शन की जरूरत थी. साल 1942 में यूनाइटेड स्टेट्स मिलिट्री को ऐसा टॉप सीक्रेट सॉल्यूशन चाहिए था जो सैनिकों को रेगिस्तान में और समुद्र के एरिया में नौ सैनिकों को होने वाले सनबर्न से बचा सके. इस चीज को ध्यान में रखते हुए थिक, डार्क और रेड सबस्टेंस वेटरनरी पेट्रोलियम तैयार किया गया जो वाटरप्रूफ थी और धूप से बचाने में बेहद कारगर थी. वैस जब जवान इस रेड पेस्ट को स्किन पर लगाते थे तो उन्हें परेशानियां होती थी.

कॉपरटोन सनटैन लोशन कैसे बना

इसके बाद साल 1944 में बेंजामिन ग्रीन ने इस रेड पेस्ट में कुछ चीजें मिलाकर इसे पूरी तरह बदल दिया. वो एक अमेरिकन फार्मासिस्ट थे और उन्होंने खुद भी जंग के दौरान इस रेड पेस्ट को स्किन पर अप्लाई किया था. बाद में उन्होंने इसमें कोकोआ बटर और कोकोनट ऑयल को मिलाया. ये कॉम्बिनेशन बेस्ट था क्योंकि इससे लोशन में चिपचिपापन कम हुआ, स्मूदनेस बढ़ी और स्वीट स्मेल भी आने लगी. ग्रीन की इस खोज को पब्लिक में बेचा गया. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। इस तरह ये एक फेमस कॉपरटोन सनटैन लोशन बन गया.

ग्लेशियर क्रीम और एसपीएफ

इसके बाद फ्रांज ग्रेटियर ने साल 1946 में अपने फॉर्मूला को बेचना शुरू किया और इसे ग्लेशियर क्रीम पुकारा. उन्होंने ही सन प्रोटेक्शन फैक्टर रेटिंग सिस्टम को 1962 में इंट्रोड्यूस किया. आज ये स्टैंडर्ड ग्लोबली यूज किया जाता है. दशकों बाद आज सनस्क्रीन का दुनियाभर में एक बड़ा बाजार है. आज इसे ऐसे तैयार किया जाता है कि ये स्किन कैंसर तक से बचाव कर सके.

सनस्क्रीन कैसे करती है काम

यूवीए और यूवीबी किरणों से बचाने वाली सनस्क्रीन एक प्रोटेक्टिव लेयर के रूप में काम करती है. इसे लगाने पर ये यूवी किरणों को स्किन तक पहुंचने से पहले ही उन्हें सोख लेती है और उनकी ऊर्जा को कम हानिकारक बना देती है. वहीं मिनरल सनस्क्रीन हमारी स्किन की पर एक सेफ लेयर बनाकर यूवी किरणों को एब्जॉर्ब कर लेती है.