IDBI बैंक के निजीकरण को लेकर उठे सवालों के बीच वित्त मंत्रालय ने बैंक की बिक्री और उसकी वैल्यूएशन प्रक्रिया का बचाव किया है. मंत्रालय का कहना है कि बैंक की बिक्री के दौरान रिजर्व प्राइस यानी न्यूनतम तय कीमत में न तो कोई कटौती की गई और न ही इसे बढ़ाया गया. पूरी प्रक्रिया तय नियमों और स्वतंत्र वैल्यूएशन के आधार पर पूरी की गई है. यह विवाद तब शुरू हुआ, जब IDBI बैंक की बिक्री के लिए पहले दौर में मिली बोलियां तय कीमत से कम थीं.

बाद में दोबारा बोली मंगाई गई और कनाडा की कंपनी Fairfax Financial Holdings ने 81 रुपए प्रति शेयर की बोली लगाई. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इस सौदे में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम की कुल 60.72% हिस्सेदारी बेची जा रही है. इसकी कुल वैल्यू करीब 52,878 करोड़ रुपये बताई गई है. आइए समझते हैं कि IDBI बैंक की बिक्री को लेकर विवाद क्या है, सरकार ने क्या सफाई दी है और Fairfax की बोली को कैसे मंजूरी मिली.
IDBI बैंक की बिक्री पर विवाद क्यों हुआ?
IDBI बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया के तहत सरकार और LIC अपनी हिस्सेदारी बेच रही हैं. इसके लिए वित्त वर्ष 202526 में शुरुआती बोलियां आमंत्रित की गई थीं. रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआती दौर में मिली बोलियां 94.42 रुपए प्रति शेयर के रिजर्व प्राइस से कम थीं. इसलिए इन बोलियों को मंजूरी नहीं दी गई. इसके बाद वित्त वर्ष 202627 में योग्य बोलीदाताओं से उनकी सबसे अच्छी पेशकश यानी Best Offer मांगी गई. इस प्रोसेस में Fairfax Financial Holdings ने 81 रुपये प्रति शेयर की बोली लगाई, जिसे सरकार ने मंजूरी दे दी. यहीं से सवाल उठने लगे कि जब पहले रिजर्व प्राइस 94.42 रुपए प्रति शेयर था, तो बाद में 81 रुपए प्रति शेयर की बोली को कैसे स्वीकार कर लिया गया? इसी विवाद पर वित्त मंत्रालय ने अब विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया है.
वित्त मंत्रालय ने क्या सफाई दी?
वित्त मंत्रालय ने 29 अक्टूबर को जारी स्पष्टीकरण में कहा कि IDBI बैंक की बिक्री के दौरान रिजर्व प्राइस में कोई बदलाव नहीं किया गया. मंत्रालय के मुताबिक, शुरुआती बोली प्रक्रिया में जब प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुए, तो पहला दौर समाप्त हो गया. इसके बाद दूसरी यानी Best Offer प्रक्रिया अपनाई गई. इस दूसरी प्रक्रिया को कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स की ओर से अधिकार प्राप्त कोर ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज ऑन डिसइन्वेस्टमेंट ने निर्धारित किया था. सरकार का कहना है कि यह प्रक्रिया किसी एक बोलीदाता को फायदा पहुंचाने के लिए नहीं बनाई गई थी. इसका उद्देश्य प्रतिस्पर्धी बोली के जरिए सरकार और LIC को बेहतर कीमत दिलाना था.
बैंक की वैल्यूएशन कैसे तय की गई?
वित्त मंत्रालय के मुताबिक, IDBI बैंक की वैल्यूएशन के लिए दो स्वतंत्र सलाहकारों की मदद ली गई थी. दोनों ने अलगअलग तरीकों से बैंक की उचित कीमत का आकलन किया. बिजनेस वैल्यूएशन के लिए Market Multiple Method का इस्तेमाल किया गया. इसमें IDBI बैंक की तुलना लिस्टेड सरकारी बैंकों से की गई. इस तरीके में किसी कंपनी की वित्तीय स्थिति और बाजार में समान कंपनियों की वैल्यू के आधार पर उसकी उचित कीमत का अनुमान लगाया जाता है. दूसरी ओर, एसेट वैल्यूएशन के लिए अलग प्रक्रिया अपनाई गई. इसमें बैंक की संपत्तियों और संभावित देनदारियों को ध्यान में रखा गया. सरकार का कहना है कि दोनों वैल्यूएशन प्रक्रियाएं एकदूसरे से स्वतंत्र थीं और किसी एक पक्ष के प्रभाव में नहीं की गईं.
क्या थी Double Blind प्रक्रिया?
वित्त मंत्रालय ने अपनी सफाई में Double Blind Process का भी जिक्र किया है. इसका मतलब है कि बोली लगाने वाली कंपनी को वैल्यूएशन की जानकारी नहीं थी और वैल्यूएशन करने वाली एजेंसियों को बोली की कीमत नहीं बताई गई थी. पूरी जानकारी केवल CGD के पास थी. यह ग्रुप बोली की कीमत और स्वतंत्र वैल्यूएशन की तुलना करके यह तय करता था कि पेशकश उचित है या नहीं. सरकार का दावा है कि इस व्यवस्था से बोलीदाताओं और वैल्यूएशन एजेंसियों के बीच किसी तरह के संभावित प्रभाव को रोका गया.
सरकार को 3,917 करोड़ रुपए का अतिरिक्त फायदा कैसे हुआ?
वित्त मंत्रालय ने बताया कि नई बोली प्रक्रिया के जरिए सौदे की प्राप्त कीमत में 3,917 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई. इसके साथ ही सरकार ने विवादित टैक्स मांगों से जुड़ी संभावित देनदारी के लिए खरीदार को सीमित सुरक्षा यानी Tax Indemnity देने की व्यवस्था भी की. इस व्यवस्था के तहत संभावित टैक्स देनदारी करीब 627 करोड़ रुपए बताई गई है. सरकार का कहना है कि यह देनदारी कम संभावना वाली स्थिति है और खरीदार को भुगतान तभी किया जाएगा, जब संबंधित अतिरिक्त टैक्स वास्तव में चुकाना पड़ेगा.
मंत्रालय के अनुसार, 627 करोड़ रुपए की संभावित देनदारी के मुकाबले 3,917 करोड़ रुपए की अतिरिक्त कीमत मिली है. इससे केंद्र सरकार और LIC के लिए सौदे की वैल्यू बढ़ी है. इस डील के बाद भी केंद्र सरकार और LIC की IDBI बैंक में कुछ हिस्सेदारी बनी रहेगी. सरकार के मुताबिक, बैंक के रणनीतिक पुनर्गठन और भविष्य में कारोबार बेहतर होने से उसकी वैल्यू बढ़ सकती है. ऐसी स्थिति में बची हुई हिस्सेदारी से केंद्र सरकार और LIC को आगे भी फायदा मिल सकता है. इसलिए यह डील सिर्फ मौजूदा हिस्सेदारी बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि बैंक के भविष्य के कारोबार और वैल्यू बढ़ाने की रणनीति का भी हिस्सा है.



