
डिजिटल डेस्क। भारतीय राजनीति के फलक पर जब ‘आम आदमी पार्टी’ का उदय हुआ था, तब वह महज एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक उम्मीद थी। जंतर-मंतर की उस तपती जमीन से निकले इंकलाबी नारों ने देश को विश्वास दिलाया था कि राजनीति ‘कीचड़’ नहीं, बल्कि ‘स्वच्छता का उत्सव’ हो सकता है।
लेकिन वक्त के बेरहम पहिये ने आज एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जहां उस पवित्र आंदोलन को अपने खून-पसीने से सींचने वाले ‘संस्थापक तिनके’ एक-एक कर छिटकते चले गए। राघव चड्ढा का ताजा फैसला उसी सिलसिले की एक और कड़ी है, जिसने पार्टी के अंतर्मन पर कई सवालिया निशान टांग दिए हैं।
आदर्शों की बलि और विदाई का सिलसिला
हकीकत के आईने में देखें तो आम आदमी पार्टी का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, अपनों को खोने का उसका दर्द उतना ही गहरा है। याद कीजिये वे शुरुआती दिन, जब प्रशांत भूषण की कानूनी मेधा और योगेंद्र यादव की बौद्धिक सूझबूझ पार्टी का वैचारिक आधार हुआ करती थी। स्वराज का सपना देखने वाली इस पार्टी ने जब अपनी ही आंतरिक लोकपाल की आवाज को अनसुना किया, तो सबसे पहले ये दो स्तंभ ढह गए। योगेंद्र और प्रशांत का जाना केवल दो नेताओं का जाना नहीं था, बल्कि उस ‘आंतरिक लोकतंत्र’ की विदाई थी, जिसका वादा अन्ना आंदोलन के मंच से किया गया था।
जब कड़वाहट ने ली वफादारी की जगह
पार्टी की एक और चमकती पहचान थीं शाजिया इल्मी। टीवी डिबेट्स में विरोधियों के छक्के छुड़ाने वाली शाजिया ने जब साथ छोड़ा, तो उन्होंने सीधे तौर पर ‘खास आदमी’ वाली संस्कृति पर चोट की। इसके बाद नाम आता है आशुतोष का। पत्रकारिता की दुनिया छोड़कर बदलाव की राह पर निकले आशुतोष की आंखों में जो उम्मीद थी, वह पार्टी के सत्ता केंद्रित समीकरणों के बीच कहीं गुम हो गई। ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। उन्होंने खामोशी से किनारा कर लिया, लेकिन उनकी वह चुप्पी बहुत कुछ कह गई।
कवि की पीड़ा और बगावत के स्वर
भला उस दौर को कौन भूल सकता है जब कुमार विश्वास के शब्दों ने युवाओं के भीतर देशभक्ति का जज्बा भरा था। ‘अभिमन्यु’ की तरह अपनों के ही चक्रव्यूह में घिरे कुमार विश्वास ने जब राज्यसभा की राह में रोड़े देखे, तो उनके काव्य में सत्ता के प्रति तल्खी उतर आई।
“मेरे लहजे में जी-हुजूर न था, इससे ज्यादा मेरा कसूर न था” कुमार के ये शब्द आज भी आम आदमी पार्टी के गलियारों में गूंजते हैं। वहीं, कपिल मिश्रा जैसे तेजतर्रार जमीनी नेता की बगावत ने तो पार्टी के भ्रष्टाचार विरोधी दावों की जड़ों को ही हिला कर रख दिया था।
उम्मीदों का आखिरी किला भी ढहा
और अब, इस फेहरिस्त में राघव चड्ढा का नाम जुड़ना किसी वज्रपात से कम नहीं है। राघव केवल एक सांसद नहीं थे, वे उस नई पौध के प्रतीक थे जो अरविंद केजरीवाल की ‘आंख और कान’ माने जाते थे। उनका यह कहना कि “जिस पार्टी को खून से सींचा, वह अब मार्ग से भटक गई है”, एक गंभीर आत्मचिंतन की मांग करता है। राघव का भाजपा की ओर रुख करना यह संकेत देता है कि अब ‘आप’ के भीतर वह वैचारिक ऑक्सीजन खत्म हो चुकी है, जिसके दम पर नौजवान अपना करियर दांव पर लगाकर यहां आए थे।
कहां खो गई वह चमक?
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में सत्ता के शिखर को तो छू लिया, लेकिन अपने उन सारथियों को खो दिया जिन्होंने रथ को मिट्टी से उठाकर सिंहासन तक पहुंचाया था।
राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन जब ‘स्वजन’ ही ‘शत्रु’ या ‘पराए’ लगने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं बुनियाद में दरार आ गई है।
अन्ना आंदोलन की उस पावन अग्नि से निकले ये सभी सितारे आज अलग-अलग दिशाओं में अपनी राह खोज रहे हैं। कोई भाजपा के भगवा रंग में रंगा है, कोई अपनी नई जमीन तलाश रहा है, तो कोई गुमनामी के अंधेरे में उन सुनहरे दिनों को याद कर रहा है।
लब्बोलुआब यह है कि जिस ‘झाड़ू’ ने व्यवस्था की गंदगी साफ करने का बीड़ा उठाया था, आज उसी झाड़ू के अपने तिनके बिखर रहे हैं। राघव चड्ढा का जाना शायद इस बात की अंतिम तस्दीक है कि ‘आम आदमी’ के नाम पर बनी यह पार्टी अब केवल ‘सत्ता’ की भाषा समझने वाला एक पारंपरिक दल बनकर रह गई है।
क्या यह केवल महत्वाकांक्षाओं का टकराव है या फिर उस शुचिता की हार जिसे लेकर यह काफिला चला था? जवाब वक्त की कोख में है, लेकिन इतिहास जब भी लिखा जाएगा, तो इन ‘बिछड़े हुए साथियों’ के नाम इस आंदोलन की अधूरी दास्तां बयान करते रहेंगे।