ग्रामीणों को अब अपने पशुओं की सेहत की चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि महिलाएं आज प्रशिक्षित पशु सखी बनकर पशुओं की प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं की उपलब्धता और पोषण संबंधी सलाह के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे रही हैं.

अभी कुल 8,992 प्रशिक्षित पशु सखियां अपनी सेवाएं दे रही हैं. चलिए जानते है ऐसी पशु सखी के बारे में जिन्होंने पशु सखी बनकर न केवल पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार लाने में मदद की,बल्कि ग्रामीण पशुपालकों के लिए भी नई उम्मीद बनीं.

पशुपालन ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का आधार

पशु सखी मॉडल की सफलता की कहानी वैशाली में देखने को मिल रही है. संगीता कुमारी वैशाली की रहने वाली हैं. वह बताती हैं कि उनको यह सौभाग्य मिला है कि वह अब पशुओं की देखभाल करेंगी. पशुओं को अब किसी भी तरह की परेशानी नहीं होगी. किसी भी पशुपालक का फोन आता है, तो वह मौके पर पहुंच जाती हैं. मुझसे जहां तक होता है, मैं उनकी दवाइयों के लिए मदद करती हूं.

आगे वह बताती हैं कि पहले पशुपालक हम लोगों पर भरोसा नहीं करते थे, लेकिन जानकारी के अभाव में पशुओं के बच्चे जन्म के बाद ही मर जाते थे. इस समस्या को दूर करने के लिए मैंने गांव में पशुओं को कृमिनाशक दवा पिलाने की सलाह दी. शुरुआत में लोग दवा देने से डरते थे, लेकिन मैंने उन्हें लगातार समझाया. फिर धीरेधीरे मैंने उनका विश्वास जीता. जब कुछ दिनों बाद मैं दोबारा गांव में गई,तो पशुओं की सेहत में काफी सुधार देखने को मिला. इसके लिए मैं मुख्यमंत्री जी का धन्यवाद करूंगी, जिनकी वजह से मुझे पशुओं की सेवा करने का मौका मिला है.

पशुओं की बेहतर देखभाल

पशुपालन ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है. ऐसे में प्रशिक्षित पशु सखियों की उपलब्धता से पशुपालकों को समय पर प्राथमिक सहायता और जरूरी सलाह मिल रही है, जिससे पशुओं को बीमारियों से बचाने, पशुधन के नुकसान को कम करने और पशुपालन को ज्यादा लाभकारी बनाने में मदद मिल रही है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। इसके साथ ही, यह पहल महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित करने के साथसाथ ग्रामीण परिवारों की आर्थिक सुरक्षा मजबूत करने में भी योगदान दे रही है.

क्या कहते हैं आंकड़े

आपको बता दें कि गया में सबसे ज्यादा 540 पशु सखियां सेवाएं दे रही हैं. इसके बाद मुजफ्फरपुर में 443, कटिहार में 432, नवादा और पूर्णिया में 430430, नालंदा में 424, रोहतास में 423, पटना में 387, सीतामढ़ी में 377 और पश्चिमी चंपारण में 372 पशु सखियां अपनी सेवाएं दे रही हैं. पशु सखी मॉडल की पहल यह बताती है कि सही प्रशिक्षण, सरकार से सहयोग और अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं पशुधन संरक्षण से लेकर परिवारों की आय बढ़ाने में बराबर की भागीदारी निभा सकती हैं. गांवों की ये डॉक्टर दीदियां महिला सशक्तीकरण और समृद्ध ग्रामीण बिहार की नई पहचान बन रही हैं.