इस हफ्ते भारतीय शेयर बाज़ार दबाव में रहे. निफ्टी 50 में लगातार सात हफ्तों से गिरावट का सिलसिला जारी रहा—जो पिछले छह सालों में सबसे लंबा दौर है. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, US ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी, जियोपॉलिटिकल टेंशन और तेजी से FII की बिकवाली के कारण निवेशकों में रिस्क लेने का उत्साह कम देखने को मिला.

तेल की कीमतों में नरमी और वैल्यू बाइंग के कारण बाद में आई रिकवरी के बावजूद, निफ्टी में इस हफ्ते लगभग 0.88% की गिरावट आई. विदेशी निवेशकों ने सबसे ज्यादा बिकवाली की. उन्होंने इस महीने 25 सितंबर तक लगभग 18,531 करोड़ रुपए निकाले, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने लगभग 52,617 करोड़ रुपए की खरीदारी करके इस बिकवाली को संभाला.
जानकारों का मानना है कि अगले हफ्ते भारतीय शेयर बाज़ार की चाल कच्चे तेल की कीमतों, ग्लोबल बॉन्ड यील्ड, जियोपॉलिटिकल घटनाक्रम और FII के निवेश पर निर्भर करेगी. ब्याज दरों और ग्लोबल लिक्विडिटी के संकेतों के लिए US के आर्थिक डेटा और फेडरल रिजर्व के बयानों पर नजर रहेगी, जबकि घरेलू इंडस्ट्रियल डेटा से भारत की ग्रोथ की रफ्तार और मजबूती का पता चलेगा.
क्या कीमतों में कमी से कुछ राहत मिल सकती है?
भारतीय इक्विटी के लिए कच्चा तेल एक अहम फैक्टर बना रहेगा, क्योंकि इसकी ऊंची कीमतें महंगाई, कॉर्पोरेट मार्जिन और घरेलू मैक्रोइकोनॉमिक माहौल पर असर डालती रहेंगी. जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के रिसर्च हेड विनोद नायर ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि निवेशक USईरान विवाद और फिर से शुरू हो सकने वाली डिप्लोमैटिक बातचीत, साथ ही USचीन चर्चाओं पर बारीकी से नजर रख रहे हैं.
नायर ने कहा कि हालांकि हफ्ते के आखिर में कच्चे तेल की कीमतें कम हुईं, लेकिन ज्यादा उतारचढ़ाव की वजह से महंगाई की चिंताएं बनी रहीं, जिससे मार्केट का सेंटीमेंट प्रभावित हुआ. इसके उलट, सितंबर के लिए भारत के फ्लैश PMI अनुमान उम्मीद से बेहतर रहे, जो मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में मजबूत गतिविधि का संकेत देते हैं.
उन्होंने कहा कि US यील्ड में बढ़ोतरी से उभरते बाज़ारों में निवेश के प्रवाह पर दबाव बना हुआ है, जिससे घरेलू मैक्रोइकोनॉमिक राहत के मुकाबले बाहरी कारक ज़्यादा हावी हो रहे हैं.
HST वेल्थ के फाउंडर और CEO हरिसेलवन राधाकृष्णन ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि ब्रेंट क्रूड का 105106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बने रहना मैक्रोइकोनॉमिक स्तर पर कोई खास राहत देने के लिए बहुत ज़्यादा है.
राधाकृष्णन ने कहा कि USईरान बातचीत में प्रगति से तेल की कीमतों में जियोपॉलिटिकल प्रीमियम कम करने में मदद मिल सकती है, जबकि तनाव बढ़ने या सप्लाई में रुकावट आने से महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है.
एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि ब्रेंट क्रूड का भाव 100 डॉलर से ऊपर बने रहने से घरेलू मैक्रोइकोनॉमिक हालात और कॉर्पोरेट मार्जिन पर दबाव बना हुआ है, हालांकि हाल ही में तेल की कीमतों में आई थोड़ी कमी से कुछ समय के लिए राहत मिली है.
पोनमुडी ने कहा कि अगर कीमतों में गिरावट जारी रहती है तो इससे घरेलू इक्विटी को और सहारा मिल सकता है, जबकि मिडिल ईस्ट में हालात बिगड़ने पर यह ट्रेंड तेजी से बदल सकता है. उन्होंने ईरान के उस सातदिवसीय प्रस्ताव का भी जिक्र किया जो अमेरिका को दिया गया है. इसका मकसद जारी टकराव को खत्म करना और रणनीतिक रूप से अहम ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को फिर से खोलना है.
उन्होंने कहा कि अगर बातचीत आगे बढ़ती है तो इस घटनाक्रम से ग्लोबल एनर्जी सप्लाई में रुकावट की चिंताएं कम हो सकती हैं, जिससे क्रूड ऑयल में जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम भी कम हो सकता है. ये खबर आप जस्ट अभी में पढ़ रहे हैं। हालांकि, यह प्रस्ताव अमेरिका की मंजूरी पर निर्भर करेगा, इसलिए बाजार की नज़र बातचीत में होने वाले आगे के घटनाक्रमों पर बनी रहेगी.
क्या ग्लोबल लिक्विडिटी एक चुनौती बनी रहेगी?
ग्लोबल बॉन्ड यील्ड और अमेरिका के आने वाले इकोनॉमिक डेटा पर भी खास नजर रहेगी. इसका कारण भी है, निवेशक फेडरल रिजर्व की पॉलिसी और उभरते बाजारों में पैसे के बहाव पर इसके असर का आकलन कर रहे हैं.
राधाकृष्णन ने कहा कि अमेरिका के इकोनॉमिक डेटा कोर केंद्र में रहेंगे. लेबरमार्केट इंडिकेटर, महंगाई के आंकड़े और मैन्युफैक्चरिंग डेटा मॉनेटरी पॉलिसी के बारे में उम्मीदें तय करेंगे.
राधाकृष्णन ने कहा कि उम्मीद से बेहतर आंकड़े ट्रेजरी यील्ड और डॉलर को ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकते हैं, जिससे उभरते बाजारों के लिए फाइनेंशियल स्थितियां सख्त हो सकती हैं और रुपए, विदेशी पोर्टफोलियो फ्लो और भारतीय इक्विटी वैल्यूएशन पर दबाव पड़ सकता है.
उन्होंने आगे कहा कि इसके उलट, कमजोर आंकड़े ब्याज दरों को लेकर चिंता कम कर सकते हैं, बॉन्ड यील्ड घटा सकते हैं और रिस्क एसेट्स में राहत की रैली के लिए गुंजाइश बना सकते हैं. राधाकृष्णन ने कहा कि अमेरिका की 10वर्षीय ट्रेजरी यील्ड, जो अभी 5.2 फीसदी के आसपास है, ग्लोबल रिस्क लेने की क्षमता पर एक और अहम रुकावट बनी रहेगी.
नायर ने कहा कि घरेलू IIP डेटा इंडस्ट्रियल एक्टिविटी की मजबूती की परीक्षा लेगा, जबकि अमेरिका में नौकरी के मौके, GDP, कोर PCE डिफ्लेटर और PMI के आंकड़े, साथ ही फेडरल रिज़र्व के अधिकारियों की टिप्पणियां, ब्याज दरों और ग्लोबल लिक्विडिटी के बारे में उम्मीदें तय करेंगी.
क्या निफ्टी को स्थिरता मिल सकती है?
लगातार विदेशी बिकवाली ने घरेलू बेंचमार्क पर दबाव डाला है, जबकि मजबूत घरेलू संस्थागत भागीदारी ने कुछ हद तक सहारा प्रदान किया है. नायर ने कहा कि लगातार विदेशी बिकवाली ने घरेलू बेंचमार्क को नीचे खींच लिया है, व्यापक जोखिम में कमी के बीच मिडकैप शेयरों का प्रदर्शन लार्जकैप शेयरों से कम रहा है.
पोनमुडी ने कहा कि लगातार सात हफ्तों की गिरावट ने बाजार को ओवरसोल्ड बना दिया है, जबकि मजबूत डीआईआई भागीदारी बीचबीच में होने वाले सुधार के प्रयासों का समर्थन कर सकती है. उन्होंने कहा कि हालांकि, बाजार में स्थायी सुधार कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक यील्ड और भूराजनीतिक घटनाक्रमों में स्थिरता के साथसाथ एफआईआई बिकवाली में कमी पर निर्भर करेगा. राधाकृष्णन ने कहा कि घरेलू औद्योगिक और मैन्युफैक्चरिंग इंडीकेटर यह जानने में सहायक होंगे कि क्या भारत की विकास गति ऊर्जा और उधार लागत में वृद्धि का सामना कर पाएगी.
क्या निफ्टी 23,000 के लेवल को बचा पाएगा?
टेक्निकल स्थिति अभी भी दबाव में है, और 23,000 का लेवल तुरंत सपोर्ट के तौर पर अहम बना हुआ है. पोन्मुडी ने कहा कि निफ्टी 50 का ओवरऑल टेक्निकल स्ट्रक्चर कमजोर बना हुआ है, और इंडेक्स अहम मूविंग एवरेज से नीचे ट्रेड कर रहा है. पोन्मुडी ने कहा कि ऊपर की तरफ, 23,200 का लेवल तुरंत रेजिस्टेंस जोन बना हुआ है. अगर इंडेक्स 23,300 के ऊपर लगातार बना रहता है, तो इससे कुछ स्थिरता आ सकती है और 23,500 के लेवल तक रिकवरी में मदद मिल सकती है. हालांकि, जब तक इंडेक्स मजबूती से इस रेंज में वापस नहीं आता, रिकवरी की कोशिशों में बिकवाली का दबाव बना रह सकता है. उन्होंने कहा कि नीचे की तरफ, 23,000 का लेवल तुरंत और अहम सपोर्ट बना हुआ है. अगर इंडेक्स 23,000 के नीचे मजबूती से टूटता है, तो बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है और इंडेक्स 22,800 के लेवल तक जा सकता है.



