जब भी खाने से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान या जीवहत्या की बात होती है, तो चर्चा अक्सर मांसाहार और कत्लखानों तक ही सीमित रहती है. इसलिए दुनिया भर में शाकाहारी और वीगन भोजन को पूरी तरह अहिंसक और क्रूरतामुक्त माना जाता है. लेकिन क्या सचमुच हमारी थाली में आने वाले अनाज, सब्जियां और फल किसी भी जीव की मौत के बिना तैयार होते हैं?

वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और खेती से जुड़ी कई स्टडीज के मुताबिक, आधुनिक कमर्शियल फार्मिंग का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है. दुनिया भर में हर साल खेती की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में वन्यजीव, पक्षी, मछलियां और दूसरे छोटे जीव मारे जाते हैं. यह मौतें जानबूझकर नहीं होतीं, लेकिन खेती में इस्तेमाल होने वाली हार्वेस्टिंग मशीनें, जहरीले कीटनाशक, रासायनिक खाद और खेतों की बाड़ लाखोंकरोड़ों जीवों के लिए खतरा बन जाती हैं. आइए जानते हैं कि आधुनिक खेती का सबसे ज्यादा असर किन जीवों पर पड़ता है…
खेती में किन जीवों की सबसे ज्यादा मौत होती है?
1. मैदानी चूहे
खेती के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान छोटे स्तनधारी जीवों, खासकर चूहों को होता है. खेतों की जुताई, बुवाई और कटाई के समय ट्रैक्टर और कंबाइन हार्वेस्टर जैसी भारी मशीनें उनके बिलों के ऊपर से गुजरती हैं. इससे बड़ी संख्या में चूहे कुचल जाते हैं या कट जाते हैं.
2. पक्षी और उनके बच्चे
कई पक्षी खेतों और फसलों के बीच घोंसले बनाते हैं. जब फसल की कटाई होती है, तो उनके घोंसले और अंडे मशीनों की चपेट में आ जाते हैं. इसके अलावा, कीटनाशक लगे बीज खाने से भी बड़ी संख्या में पक्षियों की मौत होती है.
3. खरगोश
दुनिया के कई देशों में किसान फसलों को नुकसान से बचाने के लिए खरगोशों को मारते हैं या उनका शिकार करते हैं. इससे हर साल करोड़ों खरगोश मारे जाते हैं.
4. छिपकलियां और मेंढक
छिपकलियों और मेंढकों की त्वचा बहुत संवेदनशील होती है. खेतों में डाले जाने वाले कीटनाशक और खरपतवारनाशक इनके शरीर पर सीधा असर करते हैं. कई बार ये रसायनों के कारण धीरेधीरे मर जाते हैं.
5. जंगली मछलियां
खेतों में इस्तेमाल होने वाले रसायन बारिश के साथ बहकर नदियों और झीलों में पहुंच जाते हैं. इसे विज्ञान की भाषा में ‘एग्रीकल्चरल रनऑफ’ कहा जाता है. इससे पानी की गुणवत्ता खराब होती है और बड़ी संख्या में मछलियां मर जाती हैं.
6. सांप और रेंगने वाले जीव
सांप खेतों में चूहों की संख्या नियंत्रित करने में मदद करते हैं, लेकिन जुताई और कटाई के दौरान भारी मशीनों के नीचे आकर उनकी भी मौत हो जाती है.
7. हिरण और उनके बच्चे
व्यावसायिक खेती में खेतों के चारों ओर ऊंची बाड़ लगाई जाती है. इससे हिरणों के प्राकृतिक रास्ते और चरने की जगह खत्म हो जाती है. कई बार वे बाड़ में फंस जाते हैं या भोजन की कमी से मर जाते हैं.
8. केंचुए और दूसरे लाभदायक कीट
मिट्टी को उपजाऊ बनाने में केंचुओं और दूसरे छोटे जीवों की बड़ी भूमिका होती है. लेकिन कीटनाशकों और रासायनिक खाद के कारण हर साल खरबों केंचुए और लाभदायक कीट मर जाते हैं. इससे मिट्टी की सेहत भी खराब होती है.
विज्ञान क्या कहता है?
यह बहस नई नहीं है. साल 2003 में अमेरिका की ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के पशु विज्ञान के प्रोफेसर स्टीवन डेविस ने एक चर्चित शोध प्रकाशित किया था. उन्होंने कहा था कि पूरी तरह शाकाहारी भोजन को भी शून्यक्रूरता वाला नहीं कहा जा सकता, क्योंकि खेती के दौरान बड़ी संख्या में छोटे जीवों की मौत होती है. उन्होंने इसे सबसे कम नुकसान का सिद्धांत बताया.
मछलियां क्यों मरती हैं?
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और कई वैज्ञानिक रिपोर्टों के मुताबिक, खेतों में डाले जाने वाले नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे रसायन बारिश के साथ नदियों और झीलों में पहुंच जाते हैं. इससे पानी में शैवाल बहुत तेजी से बढ़ने लगते हैं. शैवाल पानी की ऑक्सीजन खत्म कर देते हैं. ऑक्सीजन की कमी से मछलियां और दूसरे जलीय जीव दम घुटने से मर जाते हैं. इस प्रक्रिया को यूट्रोफिकेशन कहा जाता है. जिन इलाकों में ऑक्सीजन लगभग खत्म हो जाती है, उन्हें डेड जोन कहा जाता है.
इसका मतलब मांसाहार बेहतर है?
इन तथ्यों का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मांसाहार पर्यावरण के लिए बेहतर है. विशेषज्ञों का कहना है कि पशुपालन के लिए भी बड़ी मात्रा में अनाज और चारा उगाना पड़ता है. यानी खेती से होने वाला नुकसान वहां भी जुड़ा रहता है. इसलिए शाकाहार और मांसाहार की तुलना करने के बजाय खेती को ज्यादा सुरक्षित और टिकाऊ बनाने पर ध्यान देना जरूरी है.
समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक खेती में बदलाव करके वन्यजीवों की मौत कम की जा सकती है. इसके लिए जैविक खेती, कम केमिकल्स का इस्तेमाल, वन्यजीव के अनुकूल मशीनें और बेहतर जल प्रबंधन जैसे उपाय अपनाने होंगे. ऐसी तकनीकें न सिर्फ पर्यावरण को बचाएंगी, बल्कि मिट्टी, पानी और जैव विविधता को भी लंबे समय तक सुरक्षित रखेंगी.
डिस्क्लेमर: इस स्टोरी में दिए गए आंकड़े अलगअलग रिसर्च और पर्यावरण से जुड़े संगठनों के अनुमानों पर आधारित हैं. इनकी सटीक संख्या को लेकर वैज्ञानिकों और रिसर्चर्स के बीच अभी भी मतभेद हैं. इस जानकारी का मकसद सिर्फ लोगों को इस विषय के बारे में जागरूक करना है.



